देश-विदेश

चिंतनीय है युद्ध के प्रति धार्मिक संकीर्णता (दृष्टिकोण) – डॉ. सुधाकर आशावादी

 

utkarshexpress.com – मित्र और शत्रु की पहचान संकट के समय ही होती है। संकट आर्थिक, सामाजिक और आत्म सुरक्षा का भी हो सकता है तथा अस्तित्व रक्षा हेतु युद्ध की स्थिति उत्पन्न होने से भी । युद्ध विश्व के किन्ही भी देशों के मध्य हो, कोई भी देश प्रत्यक्ष रूप से किसी के साथ खड़ा नही होना चाहता। विडम्बना यह है कि पंथ निरपेक्ष भारत में कुछ ऐसे तत्व उपस्थित हैं, जो युद्ध के समर्थन और विरोध में खड़े होने से परहेज़ नहीं करते। इज़राइल और ईरान के मध्य छिड़े युद्ध से भले ही अनेक इस्लामिक देश दूरी बनाए हुए हों, मगर भारत में व्यापक प्रतिक्रिया हो रही है। सोशल मीडिया तथा अन्य प्रकार से कोई इसे किसी विशेष धर्म पर हमला मानकर  विरोध में आवाज बुलंद कर रहा है, कोई इसे इज़राइल के स्वाभिमान बचाने की लड़ाई बता रहा है। प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले अधिकतर वे लोग हैं, जिन्हें न इज़राइल से कोई सरोकार है, न ही ईरान से। उन्हें केवल अपनी धार्मिक आस्था से सरोकार है। यह देश का दुर्भाग्य है, कि देश  में ऐसे तत्व सक्रिय हैं, जो राष्ट्र धर्म की अपेक्षा धार्मिक आस्था में अधिक विश्वास रखते हैं तथा जिनका दृष्टिकोण मानवीय संवेदना से इतर केवल धर्म विशेष के लिए संवेदना व्यक्त करने तक ही सीमित है। संसार का हर व्यक्ति जानता है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। समस्याएं वैचारिक संवाद से ही सुलझ सकती हैं। फिर भी हिंसक युद्ध के समर्थन व विरोध में खड़े लोग विश्व भर में जिस प्रकार से प्रदर्शन आदि कर रहे हैं , उससे लगता है कि उनका समर्थन या विरोध तब तक अधूरा है, जब तक कि वे मानवीय संवेदना मानव मात्र के बचाव में व्यक्त नहीं करते। ताज्जुब तब होता है कि जब भारत में रहने वाले तथाकथित पंथ निरपेक्ष तत्व बांग्लादेश में धर्म विशेष के उपासना स्थलों को आग के हवाले करने तथा धर्म विशेष के अनुयायियों की सार्वजनिक स्थलों पर हत्याएं होती देखकर आँखें मूँद लेते हैं, जिन्हें पाकिस्तान में धर्म विशेष के अनुयायियों की बहन, बेटियों का अपहरण एवं जबरिया निकाह जैसा जघन्य कृत्य भी अमानवीय दिखाई नहीं देता। यही नहीं जिन्हें पश्चिमी बंगाल में अवैध घुसपैठियों की अराजकता में कुछ भी गलत दिखाई नहीं देता। विश्व शांति की बात करने वाले लोग और उनके सुर में सुर मिलाते राजनीतिक दलों को अपना दोहरा चरित्र दिखाने में भी लज्जा नहीं आती। सच तो यह भी है कि दूसरों के घर की आंच पर रोटी सेंकने का सपना देखने वाले लोग  अपने घर में उत्पात मचाने वालों पर अंकुश लगाने की बात कभी नहीं करते। विश्व भर में अनेक देश कभी अपनी विस्तारवादी नीतियों के चलते और कभी अपनी आत्मरक्षा हेतु युद्ध के मुहाने पर खुद को खड़ा करते ही हैं। बड़े बड़े देश अपने हथियार बेचने के लिए युद्ध के लिए अपने ग्राहक देशों को उकसाते भी हैं, किन्तु इसका आशय यह तो नहीं कि युद्धोन्माद में मानवता को ही भुला दिया जाए या मानवता की अवहेलना करके युद्ध का समर्थन एवं विरोध करके अपने गिरेवान में झाँकने से परहेज किया जाए। यह चिंतनीय विषय है, जिस पर व्यापक बहस होनी अपेक्षित है। (विभूति फीचर्स)

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