शान्त हो मन आदियोगी – ऋतुबाला रस्तोगी

है विकल व्याकुल व्यथित चिंतित दुखित मन ,
अब बरसना चाहते हैं नेत्र सावन।
घनन घन घन घनन घन घन
शान्त हो मन, आदियोगी!
हैं चढ़े ऊँचे सफलता के शिखर पर,
किन्तु अंतर्मन कहीं से ढह रहा है।
दिख रही ज्वाला धधकती शान्त लेकिन,
कुछ हृदय में है अभी तक दह रहा है।
नष्ट मन का कोप कर दो,
कष्ट का अब लोप कर दो,
शून्य में हो नित्य नर्तन….
छनन छन छन,छनन छन छन
शान्त हो मन,आदियोगी!
जम गईं हैं रक्त बूंदे हिम कणों सी,
गर्म लावा-सा नसों में बह रहा है।
शब्द अधरों में फँसे बंदी सरीखे,
मौन,आँखों से सभी कुछ कह रहा है।
मोह बंधन चूर कर दो,
अब सभी से दूर कर दो,
सत्य हो बस झूठ वर्जन…..
सनन सन सन सनन सन सन
शान्त हो मन, आदियोगी!
छोड़कर जाता नहीं गत कष्ट निर्मम,
बीत कर भी साथ में क्यों रह रहा है?
चाहता है भूल जाना किन्तु बेबस
उस विगत को मन अभी तक सह रहा है।
सब दुखों का अंत कर दो,
अब हृदय को संत कर दो,
काव्यमय हो शब्द सर्जन……
धनन धन धन धनन धन धन
शान्त हो मन, आदियोगी!
-ऋतुबाला रस्तोगी, चाँदपुर, बिजनौर, उत्तर प्रदेश




