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सफर में … ( कहानी) डॉ. सुधाकर आशावादी

utkarshexpress.com – दोनों सफर में थे।
वयस्क थे, अपना भला बुरा खूब समझते थे।
टीन एजर्स भी नहीं, जो कल्पनाओं में ही जी रहे हों।
दो यात्रियों वाली सीट थी,सो किसी तीसरे के दखल का प्रश्न ही नहीं था।
युवक ने प्रश्न किया – ‘ कहीं आप वो तो नहीं ?’
युवती वही थी , सो बिना विलम्ब के उसने प्रतिप्रश्न किया – ‘आपने कैसे पहचाना ?’
‘मैंने कॉलेज कैम्पस में आपके पोस्टर देखे थे, सो पहचान लिया , वैसे भी कौन होगा , जो सेलिब्रिटी को नहीं पहचानेगा।’
बातों का सिलसिला यूँ प्रारंभ हुआ। दोनों में से किसी को ऐसा प्रतीत ही नहीं हुआ कि यह उनकी पहली मुलाकात है। वह उसके बेबाक अंदाज़ से प्रभावित हुई। पचपन किलोमीटर का सफर कब पूरा हो गया , पता ही नहीं चला। दोनों ने अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान किया, किन्तु आकर्षण दोनों ओर से बराबर था। वह उसका नाम पहले से ही जानता था तथा अपना पूर्ण परिचय वह भी दे चुका था। दोनों आपस में अजनबी नहीं रह गए थे। फिर दोनों का मिलना जुलना प्रारंभ हुआ। पहले ही सुनिश्चित कर लेते थे, कितने बजे किस बस से गंतव्य के लिए निकलना है , कहाँ मिलना है, कब लौटना है। संचार क्रांति भी इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही थी।
सुमित ने रिया को जीवनसंगिनी बनाने के स्वप्न देखने शुरू कर दिए। उसकी आँखों में सिर्फ रिया का चेहरा ही जैसे रम गया हो। वह रिया की पारिवारिक स्थितियों के अन्वेषण में जुट गया। जानकारी कराई कि रिया के पिता कैसे स्वभाव के हैं, वे इस सम्बन्ध को स्वीकार करेंगे भी या नहीं। रिया के परिवार में अन्य कौन कौन हैं ? रिया को अपनाने के लिए किस प्रकार के प्रयास किये जाएं, जो रिया आँखों से उतर कर अंक में समा जाए।
रिया भी सुमित के परिवार के संदर्भ में जिज्ञासु हो गई। सुमित के परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति किस प्रकार की है ? क्या सुमित का परिवार भी सुमित की भांति आधुनिक उन्मुक्तता में विश्वास रखता है ? परिवार में स्नेह और सद्भावों की क्या स्थिति है ? सुमित ने एक सुलझे हुए व्यक्ति की तरह रिया की जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए परिवार की सच्चाई उगल दी, कि माँ और पिताजी में सदैव अनबन रहती है। धन की कोई कमी नहीं है। परिवार में दो भाई और एक बहन है। बहिन सबसे बड़ी है। उसकी आयु भी कम नहीं है। उसके विवाह हेतु अनेक प्रयास किये जा रहे हैं, किन्तु सफलता नहीं मिल पा रही है।
रिया की आयु भी विवाह योग्य है, सुमित अडिग है कि विवाह उसी से करेगा लेकिन शर्त एक है कि पहले उसकी बड़ी बहिन का विवाह हो , तभी वह सर पर विवाह का सेहरा बांधेगा। इसमें रिया को भी आपत्ति नहीं है, मगर रिया की भी शर्त है – शादी के उपरांत अनावश्यक बंधन नहीं सहेगी। अपनी उन्मुक्त जीवन शैली में कोई परिवर्तन नहीं करेगी। सासू माँ यदि झगड़ालू हुई, तो उनकी एक न सुनेगी। सुमित को उसकी शर्त मंजूर है, फिर भी वह चाहता है कि रिया उसके परिवार में आकर सामंजस्य बना कर रहे। समय द्रुत गति से बढ़ रहा है। सुमित और उसका परिवार बेटी के विवाह के लिए तनिक भी चिंतित नहीं है। तीस बरस की अवस्था पूर्ण कर लेने पर भी वर पक्ष में कोई न कोई कमी निकालकर विवाह सम्बन्ध तय करने से पीछे हट रहा है। कहीं लड़का अच्छा मिल रहा है, तो उसकी पारिवारिक स्थिति आड़े आ जाती है, कहीं परिवार उपयुक्त है तो लड़का कन्या के योग्य प्रतीत नहीं होता। कन्या ने बीडीएस की उपाधि प्राप्त की है, किन्तु व्यावहारिक रूप से वह दंत चिकित्सा के कौशल से वंचित है। बिना रुचि के उसे यह उपाधि दिलाई गई है निजी डेंटल कॉलेज से। उस समय उसके कुछ सीनियर्स ने उसके सम्मुख विवाह हेतु प्रस्ताव रखा भी था, किन्तु परिवार को प्रस्ताव पसंद न थे , पैसे की चमक के सम्मुख डेंटल सर्जन का कद कुछ बौना प्रतीत हो रहा था , उसके परिवार को। परिवार उसके लिए प्रशासनिक अधिकारी वर ढूंढना चाहता था। जैसे जैसे उसकी आयु बढ़ती गई , वैसे वैसे उसका शरीर भी बेडोल होना प्रारंभ हो गया तथा वर की व्यावसायिक प्राथमिकताओं का कद भी घटना शुरू हो गया।
रिया के स्वप्नों का राजकुमार भी आखिर कब तक अपने पद पर आसीन रहता। वैचारिक धरातल पर रिया को ऐसा प्रतीत होने लगा कि कहीं वह सुमित के प्रेम में छली तो नहीं जा रही। विवाह के सम्बन्ध में रखी गई शर्त के अंतर्गत समय-सीमा तो सुनिश्चित थी ही नहीं। साल दर साल तीन साल केवल आश्वासनों की बलि चढ़ गए। समस्या का समाधान ही नहीं निकला। सुमित भी तो विवश था। जब तक घर में बड़ी बहिन अविवाहित हो, छोटा भाई विवाह की कल्पना भी कैसे कर सकता है।
रिया किसी भी परिस्थिति में समझौता करने के स्थिति में नहीं थी तो उसने सुमित पर विवाह हेतु दबाव बनाना शुरू किया – ‘आखिर कब तक यूँ ही प्रतीक्षा की जाती रहेगी।
यदि समाज सुमित के परिवार पर प्रश्न चिन्ह लगा सकता है, तो रिया का परिवार इससे कैसे अछूता रह सकता है , कि विवाह योग्य होने पर भी उसके लिए वर की तलाश क्यों नहीं की जा रही है ?’
सुमित भी लम्बी प्रेम प्रक्रिया से ऊबने लगा , सो नई नई शर्ते खुलकर व्यक्त करने लगा – ‘पहले मेरी माँ है बाद में कोई और है, माँ का कहना है यदि रिया इस घर में बहू बनकर आई, तो वह उसे नहीं स्वीकारेगी।’ बहुत दिनों बाद सुमित को अपने श्रवण कुमार होने का भान हुआ है। वह अपने आप को माँ का आज्ञाकारी सिद्ध करने पर तुला है।
निसंदेह रिया के लिए यह अकल्पनीय स्थिति है, यौवन के तीन वर्ष उसने केवल आश्वासन की बलिवेदी पर स्वाहा कर दिए है। रिया के सम्मुख सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह यही है कि वह क्या करे ? सुमित के आश्वासनों का स्मरण सुमित को कराती रहे या अपने सुखद दाम्पत्य पथ की तलाश में नया सफर शुरू करे। आधुनिक परिप्रेक्ष्य ने यही तो सौंपा है रिया सरीखी युवतियों को। (विभूति फीचर्स)

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