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मेरी कलम से – रुचि मित्तल

तुम्हारी आँख का आँसू हमारी आँख में गुम है
बड़े नादाँ हो अब भी पूछते हो आशिकी क्या है?
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कृष्ण कन्हैया राधा के संग मैं भी हूँ अलबेली
कृष्ण कन्हैया सखा है मेरा, राधा बनी सहेली।
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मोर मुकुट सर पर सजा,कमल सरीखे नैनl,
कृष्णा तेरे जन्म की , आयी पावन रैन।
घर घर में दीपक जले, गोकुल है बैचेन,
दरस दिखा मोहन जरा,मिले तभी कुछ चैन।
©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा




