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होली का त्योहार – विदयुत पुष्कर

जली होलिका अग्नि में, उसका भी उद्धार।
सत्य सनातन विजय का, सांकेतिक त्योहार।।
भक्त शिरोमणि का सुना, प्रभु ने अंतर्नाद।
तभी खम्ब से हो प्रकट, किया उन्हें आबाद।।
भस्म कीजिए द्वेष सब, जला होलिका संग।
मिलकर रंग लगाइए, प्रेम भाव अतरंग।।
रंग भरा त्योहार यह, प्रेम मिलन का सार।
एक रंग में है रंगा, यह पूरा संसार।।
नेह रंग में रंग रहा, योगेश्वर का धाम।
सोह रहे संग राधिका, रंग भरे घनश्याम।।
रंग गुलाबी हो गया, सतरंगी नभ छोर।
सभी युगल मिल खेलते, होकर भाव विभोर।।
मन बसिया के नेह से, परिपूरित हर पोर।
कनखिन रहे निहारता, नटवर नंद किशोर।।
श्यामल मनहर छेड़ता, जब मीठी सी तान।
खड़े हुए ब्रज बाल सब, हो जाते बेजान।।
आह्लादित वासी हुए, बजे ढोल मुरचंग।
प्रेम मगन सब झूमते, चढ़ा अनोखा रंग।।
– विदयुत पुष्कर, देहरादून, उत्तराखंड




