मनोरंजन
अनपढ़ माँ – अमित कुमार

अनपढ़ माँ की जग को कोटि-कोटि प्रणाम,
जिसने लिख दी जीवन पर अपनी ममता की शाम।
अक्षर न पहचान सकी, पर मन पढ़ लेती थी,
मेरी हर चुप्पी में छिपी पीड़ा गिन लेती थी।
फटी हुई चुनरी में सपने सीं देती थी,
सूखी रोटी खाकर मुझको घी दे देती थी।
खुद अँधेरे में रहकर दीप जलाती थी,
मेरे हर कल के लिए आज मिटाती थी।
किताबों का ज्ञान नहीं, पर समझ अपार,
उसकी गोद में मिलता था सारा संसार।
थकी हुई आँखों में भी उजियारा था,
मेरे गिरने से पहले उसका सहारा था।
जब तक चाँद-सूरज नभ में धाम रहेगा,
माँ, तेरा त्याग अमर नाम रहेगा।
धरती पर ईश्वर का सच्चा धाम —
अनपढ़ माँ को शत-शत प्रणाम।
-डॉ अमित कुमार बिजनौरी
कदराबाद खुर्द, स्योहारा
जिला बिजनौर उत्तर प्रदेश




