सबके मन में लाखों पेंच – अनिरुद्ध कुमार

झूठ कहीं त सब कोई पूजें,
साँच कहीं त लागे ठेस।
झूठ साँच में समय गुजारी,
पग-पग देखीं बदलल भेष।।
केहू के मन साफा नइखे,
रातों-दिन होतावे क्लेश।
हर कोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच।।
कलयुग के काली के महिमा,
हमरें जामल पाठ पढ़ावे।
हम मोट मीठे रहगइनी,
ई मेंही चीनी कहलाये।।
जारी रोज चलावेला ई,
बोले सब कुछ देहब बेच।
हर कोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच।।
केहू ना मानेला कहना,
सबके चाहीं गाड़ल गहना।
उलटा पुलटा भाखा बोले,
भायेला ना रोटी तियना।
हर कोई चाहे बटवारा,
रोजे झगड़ें फेटा खेंच।
हर कोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच।।
टूटल बा नल रोज सुनाता,
घर के सबे लोग नापाता।
केहू के ना चिंता बावे,
बहरा से पानी खींचाता।
बबुआजी से कहले मुश्किल,
बेबाते हीं पटकस रेंच।
हर कोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच।।
टुकुर टुकुर देखेंनी सबके,
करनी धरनी अपना मन के।
आगा पाछा के सोंचेला,
लालच बावे सबके धन के।
हम सिधवा सीधे रहगइनी,
का टोकी, बोलेला फ्रेंच।
हर कोई बावे अझुराइल,
सबके मन में लाखों पेंच।।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड




