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अभी धरा पर – ज्योत्सना जोशी

अभी धरा पर नव अम्बु गिरे हैं
उर की कोपल मनुहार करें
तुम श्रृंगार ओढ़ मधुमास का
नैनन में प्रिय घन विस्तार भरें।
अभी धरा पर………
जगा कर प्रणय आमंत्रण
धुले हैं अश्क ने सज काजल
पुरानी हर बात को भूलें
छिटक बूंदों से शुष्क कोने।
अभी धरा पर……..
थमी एक आह सी मचले
विकलता तोय सी पिघले
सजल अविकल आलम्बन
सरस पावस गीत सा गूंजें।
अभी धरा पर……..
स्पन्धन मर्म स्निग्धा में
अचल अनुराग अतल तुमसे
सुधा अंजुरी में भरकर
धवल स्मृतियों सा ठहरे।
अभी धरा पर…….
यामिनी संग में बंध के
पलक के छोर पर मेरे
चले आना मधु स्वप्न बनकर
तोड़ सतत मौन बंधन सारे।
– ज्योत्सना जोशी, देहरादून




