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रह गई मन की मन में – गुरुदीन वर्मा

रह गई मन की मन में, कर नहीं पाये वह मगर।
सब कुछ हाथ में ही था, कर नहीं पाये वह मगर।।
रह गई मन की मन में,—————-।।
उनको थी रस्में बहुत पसंद, रस्म हर हमने निभाई।
रस्म मिलन की थी एक बाकी, निभा नहीं पाये वह मगर।।
रह गई मन की मन में,—————-।।
हंसने का उनका शौक था, गुल बहुत दिल के खिलाये।
चिराग हाथ में वह लिये थे, जला नहीं पाये वह मगर।।
रह गई मन की मन में,—————-।।
मुस्करा रहे थे वो भी तो, देखकर हालत हमारी।
बस उठाना था परदा, उठा नहीं पाये वह मगर।।
रह गई मन की मन में,—————–।।
चाहत जिसकी थी दिल को, दूर नहीं था वह निगाहों से।
रह गई दिल की बात अधूरी, मिल नहीं पाये वह मगर।।
रह गई मन की मन में,—————–।।
– गुरुदीन वर्मा आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां (राजस्थान)




