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ग़ज़ल – मणि अग्रवाल

लाचारी से पहले ख़ूब निहारेगा,
तब ही कोई अरमानों को मारेगा।
माँ-बाबा का हाथ न हो जिसके सर पर,
कौन नज़र फिर उसकी रोज़ उतारेगा।
सोच ज़रा-सी अपनी बस ऊँची कर ले,
भाग्य तुझे लाखों के बीच पुकारेगा।
बात भला कब किसको ये मालूम हुई,
वक़्त किसी का कैसे द्वार पधारेगा।
जीवन हो संगीत चलो गाएँ मिलकर,
सा रे गा मा पा धा नी सा सा रे गा।
अब सुलझाना छोड़ दिया है मैंने तो,
जब आयेगा तू ही केश सँवारेगा।
ग़म उलझन आँसू आहों वाला हर पल,
वादा कर “मणि” के ही साथ गुज़ारेगा।
-मणि अग्रवाल “मणिका”
देहरादून उत्तराखंड




