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ढाई आख़र – सविता सिंह

 

तुम्हारी यह प्रेम भरी बातें

न जाने क्यों मुझमे प्रेम नहीं भर पाती।

मत कहो तुम प्यार करते हो

आई लव यू ये शब्द हमें लुभाते नहीं।

यह ढाई आख़र ढाई रहे तो प्रेम।

तुम वैसा प्रेम कर पाओगे

जैसा नवजात शिशु स्वतः ही

पहली बार माँ कहे और उसे

सुन महसूस कर माँ के मनोभाव।

या फिर धर्मवीर भारती की सुधा चंदर सम।

तुम प्रीत रखो ना काला पत्थर

सिनेमा के अमिताभ राखी जैसा,

या फिर, वैसा जैसे कभी-कभी में

अमिताभ कहतें है कि तुमने

अपनी आँखें देखी है?

जहाँ देखती हो रिश्ता बन जाता है।

तुम बुद्ध मत बनो न ही राम

सीता शायद ही कभी बन सके कोई।

हाँ तुम कृष्ण बनो

क्योंकि केशव कहते ही

मानस पटल पर तैर जाती है राधा।

मैं बनूँगी मीरा, बनूँ क्या वो तो हूँ,

मीरा कहो तो मोहन चले आतें हैं।

कहते हैं कि कृष्ण जब काँपते थे

तो लोग कहते हैं शायद राधा

ने ठंडे पानी को छुआ होगा।

कुछ ऐसा नहीं हो सकता?

काश की हो ऐसा

रच जाये इतिहास।

मैं तो तैयार हूँ

तुम कर पाओगे?

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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