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तृतीय नवरात्र – डा० क्षमा कौशिक

रूप पावन अति मनभावन चंद्रघंटा का।
तृतय दिवस पूजन करो माँ चंद्रघंटा का।।
महिषासुर का वध किया, धारा रूप कराल।
अपने भक्तों पर सदा, होती रही निहाल।।
मंद मंद मुस्कान है, अतुलित मुख पर तेज।
वक्र भृकुटि को देख कर, क्षय हो अरि का तेज।।
घंटे का रव घोर है, शस्त्रों की झंकार।
असुरों के संहार को, भरती है हुंकार।।
कोलाहल रण घोर है, शस्त्रों की टंकार ।
घंटों के अति नाद से, मचता हाहाकार।
देवों की रक्षा करे, असुरों का संहार।
संकट भक्तों पर पड़े, तुरत करे उद्धार।।
सिंह वाहिनी शोभती, ओढ़े लाल दुकूल।
भाव भक्ति से राजती , रहे सदा अनुकूल।।
मणिपूर्णा चक्र में माँ, करती है आधान।
प्रेम शांति आरोग्य का, देती है वरदान।।
– डा० क्षमा कौशिक, देहरादून, उत्तराखंड



