परिणय दिवस – भूपेन्द्र राघव

मन को हारा तब मन जीता
अद्भुत जीत और हार सुनो
सकल विश्व में तुमसे प्यारा
कोई नहीं उपहार सुनो
सप्त गगन के चाँद सितारे
मैंने ढूंढे जा-जाकर
सब तेरी आँखों में खोये
देख रहे थे मुस्काकर
काली घटा रात और नागिन
सब अपना मुँह मोड़ रहीं
उपमासन छिनने के डर से
स्वेद भाल पर छोड़ रहीं
चपला भृकुटि चढ़ाए बैठी
लेने को प्रतिकार सुनो
सकल विश्व …………………
पुष्प और कोरी कलियों की
इन अधरों से मात हुई
और सुर्ख होकर शरमाईं
जब-जब तेरी बात हुई
चन्दन के तरु अपने मन में
जब चन्दन की बात करें
झूमें कुसुमित मुदित सयाने
तेरे तन की बात करें
केशर क्यारी, शाम सुहानी
करती हैं आभार सुनो
सकल विश्व …………………
घुली हुई हैं मृदुल बातें
निर्झर पुल्क समीरों में
मुस्काहट चहचहाती रहती
शीतल नदिया तीरों में
अंग-अंग पर वह अनंग भी
आशंकित मन बैठा है
ऋतुराजा जाने क्यों मन में
चिर-चिंतित मन बैठा हैं
भृंग भ्रमित हो वलयापथ पर
देख रहा हर बार सुनो
सकल विश्व …………………
स्वर्ण-रजत के परिधानों में
लिपटी हो मिश्री जैसे
अक्षय रूप अनूप तुम्हारा
वसुंधरा पर ‘श्री’ जैसे
माह फरवरी इक्कीस आया
बिना किन्हीं श्रृंगारों के
दर्पण चकनाचूर किये हैं
तोड़े दम्भ हजारों के
कैसे तुमको चाँद लगा दे
तब भौतिक श्रृंगार सुनो
सकल विश्व …………………
– भूपेन्द्र राघव, खुर्जा, उत्तर प्रदेश




