फागुनी बहार – वैशाली रस्तोगी

#फागुनी बहार आई है,रंगों का संदेशा लाई है ।
सूखी डालियों पर भी उसने गीत सजायाहै ।
पीली-पीली सरसों हँसकर खेतों में बोली।
धरती ने ओढ़ी चूनर, मन ने बाँची होली।
बयार संग आई है मादक सी अंगड़ाई।
कोयल ने कुहुक-कुहुक कर तान छेड़ी मधुर ।
टेसू के फूलों में लाली की है बरसात।
हर पत्ती में धड़कन, हर पल में सौगात।
ढोलक की थापों पर गाँव थिरकने लगा।
बचपन फिर से आँगन में आकर बसने लगा।
माथे पर अबीर सजा, हाथों में रंग।
रूठे हुए सपनों से भी टूटे सारे भंग।
फागुनी बाहर आई प्रेम की ऋतु-गानलाई ।
बैर-विद्वेष गल जाए, मिटे मन का अभिमान।
साजन-साजन पुकारे अलसाई सी रात।
पायल बोले छन-छन, लाज करे बरसात।
इस फागुन में सीख मिले जीवन का सार।
रंग बाँटने से ही बढ़ता है सच्चा प्यार।
जो रूखा था, वह भी रस में भीग जाए।
फागुनी बहार में दिलख़ुशियाँ मनाये ।
– वैशाली रस्तोगी, लखनऊ, उत्तर प्रदेश




