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रील संस्कृति में साहित्य बना ‘कंटेंट’: क्षणिक लोकप्रियता की दौड़ में सिमटता साहित्यिक मूल्य –  डॉ. प्रियंका सौरभ

utkarshexpress.com – तथाकथित कवि/कवयित्रियाँ सतही या बनावटी पंक्तियों के सहारे साहित्य का आवरण ओढ़कर, मूलतः आकर्षण-केन्द्रित प्रस्तुति को बढ़ावा दे रही हैं। जहाँ कविता संवेदनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति होनी चाहिए, वहीं उसे कई बार केवल ध्यान खींचने का माध्यम बना दिया जाता है। इससे न केवल कविता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि गंभीर और सार्थक साहित्यिक प्रयास भी हाशिए पर चले जाते हैं। जब साहित्य जैसे गंभीर विषय को प्रस्तुत किया जाता है, तो उसमें एक संतुलन और शालीनता अपेक्षित होती है। दुर्भाग्यवश, कई बार यह संतुलन केवल दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश में खो जाता है, जिससे साहित्य की गंभीरता प्रभावित होती है।डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति के स्वरूप को अभूतपूर्व गति और विस्तार दिया है। आज हर व्यक्ति के हाथ में एक मंच है—एक ऐसा मंच, जहाँ वह अपनी बात तुरंत लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। यह लोकतंत्रीकरण अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। परंतु हर शक्ति के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। दुर्भाग्यवश, इस जिम्मेदारी का संतुलन कई बार बिगड़ता हुआ दिखाई देता है, विशेषकर तब जब उद्देश्य अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि केवल लोकप्रियता रह जाता है।
रील संस्कृति इसी असंतुलन का एक प्रमुख उदाहरण है। कुछ सेकंड के वीडियो में प्रभाव पैदा करने की होड़ ने अभिव्यक्ति को त्वरित, संक्षिप्त और कई बार सतही बना दिया है। साहित्य, जो मूलतः धैर्य, गहराई और चिंतन की मांग करता है, वह इस त्वरित उपभोग की संस्कृति में स्वयं को असहज महसूस कर रहा है। अधूरी पंक्तियाँ, संदर्भहीन उद्धरण और बनावटी भाव—ये सब मिलकर साहित्य को एक “उत्पाद” में बदल रहे हैं, जिसका उद्देश्य केवल ध्यान आकर्षित करना है।
आज “वायरल होना” ही सफलता का पैमाना बन गया है। इस मानसिकता ने सृजन की प्रक्रिया को प्रभावित किया है। लेखक अब यह सोचकर लिखता है कि क्या यह सामग्री लोगों को तुरंत आकर्षित करेगी, न कि यह कि क्या यह विचार समाज के लिए सार्थक है। परिणामस्वरूप, गहराई की जगह चटकपन और संवेदना की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। यह प्रवृत्ति न केवल साहित्य के साथ अन्याय है, बल्कि समाज के बौद्धिक स्तर को भी प्रभावित करती है।
साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। वह समाज का दर्पण है, जो उसकी वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है और उसके अंतर्विरोधों को उजागर करता है। कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया, तुलसीदास ने आस्था और मर्यादा का संदेश दिया, प्रेमचंद ने समाज के यथार्थ को उजागर किया और महादेवी वर्मा ने संवेदनाओं की सूक्ष्मता को शब्द दिए। इन सभी रचनाकारों की कृतियाँ समय की कसौटी पर इसलिए खरी उतरीं क्योंकि उनमें गहराई, ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता थी।
इसके विपरीत, आज का एक बड़ा वर्ग साहित्य को केवल प्रस्तुति का माध्यम मान बैठा है। शब्दों की सुंदरता से अधिक महत्व उनके प्रदर्शन को दिया जा रहा है। रील्स में प्रस्तुत की जाने वाली कविताएँ कई बार न तो मौलिक होती हैं और न ही उनमें कोई गहन भाव होता है। वे केवल इस उद्देश्य से बनाई जाती हैं कि दर्शक कुछ क्षणों के लिए आकर्षित हों और “लाइक” या “शेयर” कर दें।
रील संस्कृति का एक और चिंताजनक पहलू है—अभिव्यक्ति की शालीनता में गिरावट। भाषा का स्तर, उच्चारण की स्पष्टता और प्रस्तुति की गरिमा—ये सभी तत्व किसी भी साहित्यिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण अंग होते हैं। लेकिन जब इनकी अनदेखी की जाती है, तो साहित्य का स्वरूप विकृत हो जाता है। कई बार तो स्थिति यह होती है कि मूल रचना का भाव ही पूरी तरह बदल जाता है।
परिधान और दृश्यात्मक प्रस्तुति को लेकर भी बहस तेज हो गई है। यह स्वीकार करना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन हर अधिकार के साथ मर्यादा और जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। जब साहित्य जैसे गंभीर विषय को प्रस्तुत किया जाता है, तो उसमें एक संतुलन और शालीनता अपेक्षित होती है। दुर्भाग्यवश, कई बार यह संतुलन केवल दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश में खो जाता है, जिससे साहित्य की गंभीरता प्रभावित होती है।
हालाँकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम इस पूरी स्थिति को एकांगी दृष्टिकोण से न देखें। सोशल मीडिया ने कई ऐसे प्रतिभाशाली रचनाकारों को मंच दिया है, जो पारंपरिक प्रकाशन व्यवस्था तक नहीं पहुँच पाते थे। आज छोटे-छोटे शहरों और गाँवों से भी लोग अपनी रचनाएँ साझा कर रहे हैं और पहचान बना रहे हैं। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है, जिसे नकारा नहीं जा सकता।
दरअसल, समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके उपयोग के तरीके में है। रील्स भी एक प्रभावी माध्यम हो सकती हैं, यदि उनका उपयोग सार्थक साहित्य प्रस्तुत करने के लिए किया जाए। कुछ रचनाकार इस दिशा में अच्छा कार्य भी कर रहे हैं—वे संक्षिप्तता में भी गहराई बनाए रखते हैं और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। यह दर्शाता है कि यदि नीयत सही हो, तो कोई भी माध्यम साहित्य के प्रसार का सशक्त उपकरण बन सकता है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाएँ। हमें न तो रील संस्कृति को पूरी तरह खारिज करना चाहिए और न ही उसे बिना किसी आलोचना के स्वीकार करना चाहिए। इसके बजाय, हमें यह समझने की जरूरत है कि किस प्रकार इस माध्यम का उपयोग साहित्य के उत्थान के लिए किया जा सकता है।
शिक्षा संस्थानों की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि छात्रों को प्रारंभ से ही साहित्य की गहराई और उसकी सामाजिक भूमिका के बारे में जागरूक किया जाए, तो वे केवल सतही सामग्री से प्रभावित नहीं होंगे। साहित्यिक संगठनों और मंचों को भी चाहिए कि वे डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हुए गुणवत्ता युक्त सामग्री को बढ़ावा दें और रचनाकारों को सही दिशा प्रदान करें।
इसके साथ ही, दर्शकों और पाठकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब तक दर्शक सतही सामग्री को बढ़ावा देते रहेंगे, तब तक उसका उत्पादन भी जारी रहेगा। यदि वे गुणवत्ता और गहराई को प्राथमिकता देंगे, तो स्वाभाविक रूप से रचनाकार भी उसी दिशा में प्रयास करेंगे।
अंततः, यह एक सामूहिक जिम्मेदारी है—रचनाकारों, दर्शकों, शिक्षकों और समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की। हमें यह तय करना होगा कि हम साहित्य को क्षणिक लोकप्रियता की भेंट चढ़ाना चाहते हैं या उसे उसकी गरिमा और गहराई के साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं।
रील संस्कृति को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे दिशा दी जा सकती है। यदि हम सजग रहें और संतुलन बनाए रखें, तो यही माध्यम साहित्य के प्रसार का एक प्रभावी साधन भी बन सकता है।
साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं है; यह समाज की चेतना, उसकी संवेदनाओं और उसके मूल्यों का प्रतिबिंब है। यदि यह प्रतिबिंब धुंधला पड़ जाएगा, तो समाज की सोच भी अस्पष्ट हो जाएगी। इसलिए यह समय है सजग होने का, साहित्य की गरिमा को पहचानने का और उसे डिजिटल युग में भी उसी सम्मान के साथ आगे बढ़ाने का, जिसका वह हकदार है।

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