समरसता और सावधानी से मनाएं होली – सुधाकर आशावादी

utkarshexpress.com – चाहते तो सभी हैं, कि होली की मस्ती बरकरार रहे, मगर सियासत को क्या कहें, उसे किसी की ख़ुशी बर्दाश्त ही नहीं होती। उसके लिए पर्वों का कोई महत्व ही नहीं है। पहले जिस होली के लिए गलियों में बच्चे पानी भरे ग़ुब्बारों और रंग भरी पिचकारी के साथ तैनात हो जाते थे, अब वे घर की चारदीवारी में ही सकुचाए से बैठे रहने के लिए विवश रहते हैं। होली खेलना उनके लिए सपना रह गया। बाज़ारी युग में होली भी कृत्रिमता ओढ़ चुकी है।
सच तो यह है कि जो कभी हमारी संस्कृति की खूबसूरती थी, शब्दों में मिठास के साथ मीठे पकवानों के स्वाद के बीच पर्व मनाने का चलन था, उस पर भी किसी की बुरी नजर लग गई। सामाजिक परिदृश्य में कभी किसी ने वर्ण व्यवस्था को बुरा नहीं माना था । सभी वर्णों को आजादी थी, कि वे अपनी अपनी परंपराओं को निभाएं , उनके सुर में अन्य वर्ण भी अपना सुर मिलाएं। सामाजिक समरसता बनाए रखने में पर्वों का बड़ा योगदान था। मुहल्ले के चौराहों पर महीने भर पहले से ही होली की तैयारी शुरू हो जाती थी। झाड़ियों और पेड़ों की टहनियां काटकर एकत्र की जाती थी। बहरहाल यह अतीत का विषय है। प्राथमिक कक्षाओं में होली, दिवाली, दशहरे और रक्षाबंधन के निबंध रटाये जाते थे। गाय के निबंध में गाय के अंगों का चित्रण किया जाता था, गाय की दैनिक जीवन में उपयोगिता बताई जाती थी, जिसमें एक वाक्य अवश्य लिखाया जाता था, कि गाय हमारी माता है। बहरहाल निबंध कोई भी हो, प्रस्तावना, औचित्य, उपयोगिता, उपसंहार में बांटकर उसका विस्तार किया जाता था। निबंध चाहे कोई भी हो, प्रस्तावना में चार वर्णों की चर्चा करते हुए लिखा जाता था, कि रक्षाबंधन ब्राह्मणों का पर्व है, दशहरा क्षत्रियों का पर्व है, दिवाली वैश्यों का पर्व है, होली शूद्रों का पर्व है। उसके बाद उसी पर्व की व्याख्या की जाती थी, जिस पर्व पर निबंध लिखना होता था। वैसे सभी पर्वों में सभी वर्णों की पूर्ण भागीदारी होती थी। होली पर सभी एक दूसरे से गले मिलकर रंग गुलाल का प्रयोग करते थे। एक दूसरे से गले मिलने में कोई कतराता नहीं था। भेदभाव जैसी स्थिति होली पर दृष्टिगत नहीं होती थी। कई बार तो लिपे पुते चेहरों की पहचान भी नहीं होती थी।
आज स्थिति सर्वथा प्रतिकूल है। समाज को बांटने वाली शक्तियां नहीं चाहती कि समाज में समरसता का वातावरण बना रहे। कुछ संवैधानिक प्रावधान भी समरसता के विरोध में खड़े हैं। आदमी आदमी को जातियों में बांटकर भेदभाव की खाई खोदने में राजनीतिक तत्व सक्रिय हैं। अलगाव की ढपली में समरसता की बातें बेमानी लगती हैं। ऐसे में होली मनाने से डर लगता है, कि यदि बिना जाति पूछे किसी की मर्जी के बिना उस पर रंग लगा दिया , तो हो सकता है, भेदभाव पूर्ण आचरण का आरोप लगाकर कोई जेल की सलाखों के पीछे न डलवा दे। जेल में होली की गुझिया और नमक पारे के स्थान पर डंडों के उपहार से सम्मानित होना पड़े। सियासत यही चाहती है। जो स्वयं को सामाजिक समरसता के ठेकेदार समझते हैं, वे भी ऐसे अवसर पर दूरी बनाने में संकोच नहीं करेंगे। ऐसे मामलों में जमानत भी आसानी से नहीं होगी। सो इस बरस होली में सावधानी ही बचाव है। उससे बचने का एकमात्र उपाय है, कि सार्वजनिक स्थलों पर होली खेलने से दूरी बनाएं। स्वयं भी सुरक्षित रहें और परिवार को भी मुक़दमेबाजी के आसन्न संकट से बचाएं। (विभूति फीचर्स)



