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सरिता का विलय – सविता सिंह

चंचल बारिश ने आकर

टीस दिल में जगा गई

बिरहन फिर से मचल उठी

नीर भी आग लगा गई।

बैठी नदी के कूल पर

कंधे तेरे रखकर सर

बूँदे झट से बरस पड़ी

कुछ बूँद ठहरी अधर पर।

सन गई अब तो प्रीत से

बूँदे मुझको रिझा गई,

बिरहन फिर से मचल उठी

नीर भी आग लगा गई।

छुआ जो बूँद को तुमने

देख दहके ये तन बदन

नटखट बारिश रह रहकर

बढ़ा रही दिल की धड़कन।

मन पर काबू कैसे हो

रीत मीत को सीखा गई

बिरहन फिर से मचल उठी

नीर भी आग लगा गई।

तेरे वलय में सिमट कर

भीग रही थी बारिश में

प्रेम पयोधि उमड़ पड़ा

बादल की ही साजिश में।

नमी ने बूंदों की मन में

बीज प्रणय की उगा गई।

बिरहन फिर से मचल उठी

नीर भी आग लगा गई।

अब रक्तिम आनन हो गया

काया भी कंचन हो गई

मैं कहाँ रह गई थी मैं

सखे वक्ष वलय में खो गई।

आँचल में लम्हों को रख

जीवन अपना सजा गईं

बिरहन फिर से मचल उठी

नीर भी आग लगा गई।

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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