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मैं -अनिरुद्ध कुमार

अस्त्तित्व विलय तुझमे करलूँ,
अपनी पहचान मिटा लू मैं।
अर्जुन सा संशय त्यागकृष्ण
की गीता को अपना लू मैं।
मैं बनू पितामह का तप ब्रत
ओर द्रुपद सुता का मान बनूँ मैं।
मैं धर्म राज की सत्य निष्ठ सी
इस जग में पहचान बनूँ मैं।
अस्तित्व मिटाकर छुद्र बीज
भी विशद वृक्ष बन जाता है ।
वह ही पहचान बनाते हैं
जिनको मिटना आता है।
अनिरुद्ध कुमार, जमशेदपुर,, झारखण्ड




