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सोचा न था – अनुराधा पाण्डेय

भूलकर सोचा न था प्रिय !
पट मिलन के बंद होंगे।
लूट लेगा राग रस को,
वायरस लघु यह अभागा ।
देख कर शर यह निरंकुश,
प्रिय मिलन का भाव त्यागा।
दूर बैठे क्लांत मन में,
धुर विरह के छंद होंगे।
पट मिलन के बंद होंगे।
पुष्प नीरव शांत वन के,
देवता पद तक न आए ।
बैठना है इस तरह से ,
पीर को मन में दबाए ।
ज्ञात कब था व्यर्थ झरते…
पुष्प से मकरंद होंगे ।
पट मिलन के बंद होगे ।
कब पता था पूर्व सुधियाँ,
ही महज अवलम्ब होंगे।
स्वप्न में ही पिय मिलन के,
मात्र नेहिल बिम्ब होंगे ।
ज्ञात यह भी तो नहीं था,
भाग्य इतने मंद होंगे ।
पट मिलन के बंद होंगे।
टूट कर उल्का गिरेंगे,
मात्र भय अनुमान पर ही ?
क्या पता था धर्म अंधे ,
खेल लेंगे प्राण पर ही ?
आम जन अनजान ही थे…
राजनैतिक द्वन्द होंगे।
भूलकर सोचा न था प्रिय !
पट मिलन के बंद होंगे।
– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली




