प्रणयन कविता –अनुराधा

अश्रु में भीगे हुए कुछ
छंद उर में मृदु पड़े हैं
स्वर्ग सुख से,कम नही वे,
मूर्त से सपनें जड़े हैं
हाथ देना आज प्रि्यवर!
हाथ मे सब स्वप्न धर दूँ ।
आ बसो तुम आज अन्तस्,
प्राण ! तुममे प्राण भर दूँ…..
जड़ नहीँ यह आत्मा रे!
जो बधी तुमसे चिरंतन ।
मौन दृग के जलकणों से,
जो करे तुम पर नियंत्रण।
बँध गई है जो अजानी ,
द्वय हृदय की डोर प्रियतम !
वो मुझे है जा रही ले ,
मोक्ष की नित ओर प्रियतम !
क्या कहूँ कैसे हुआ यह ,
प्राणमय संयोग पावन ।
पूर्व से यह था नियोजित,
आत्मा का योग पावन ।
कौन कब किससे मिलेगा,
यह नियति की बात होती ।
पूर्व निर्धारित विरह या ,
मृदु मिलन की रात होती ।
हर्ष हो उन्माद हो या ,
हो प्रणय में क्लेश के क्षण ।
जी रहीं हूँ मैं निरंतर ,
प्रेम नव उन्मेष के क्षण ।
बह रही नित पावनी अब,
प्रेम की जलधार प्रियतम !
पा गई जबसे अमर मणि ,
दिव्य तुमसे प्यार प्रियतम !
हार कर अपना हृदय अब
लग रहा उत्सर्ग पावन ।
जागतिक सब कुछ लुटाकर,
पा गई अपवर्ग पावन ।
जी करे हर एक क्षण को ,
छंद कर दूँ गीत कर दूँ।
हार कर निज कोटि जीवन ,
मूर्त तुमको जीत कर दूँ।
कम लगे है एक जीवन ,
कोटि जीवन माँग कर लूँ।
औ तुम्हारे भग्न मन को ,
ज्योत्सना से पूर्ण भर दूँ।
शब्द से सज्जित तुम्हें मैं
आत्म का अवदान कर दूँ…
चिर सजग यह “तूलिका” प्रिय!
“तूलिका” ही दान कर दूँ।।
-अनुराधा पांडेय, द्वारिका, दिल्ली




