घुँघरू – नीलांजना गुप्ता

एक दिन घुँघरू थिरकता सा मेरे पास आया
मचल कर उसने अपना संदेश सुनाया।
आज से मौन रहने की मैंने की है प्रतिज्ञा।
कोई भी न करें इस प्रतिज्ञा की अवज्ञा।
पहले तो मैं थोड़ा सा मुस्कराई।
उस मासूम को अपनी बात समझाई।
तेरा तो काम ही है महफिलों में जाना।
और तू इसी से अब तक गया है पहचाना।
सोच अगर तू ही मौन हो जायेगा।
अमीरजादों का दिल कौन बहलाएगा।
टूटे दिल बिगड़े आशिक़ कहाँ जायेगें ।
जीते जी मर जायेंगे, समाज में गंदगी फैलायेंगे
सच ! तूने स्वयं को गुमनाम किया है।
पर समाज में बहुत बड़ा एहसान किया है।
क्या तू चाह कर भी चुप रह पाएगा।
यह अय्याश समाज तुझे ज़बरदस्ती नचायेगा
पर यह तो बता, क्यों उठा मस्तिष्क में प्रतिज्ञा का विचार
कुछ मैं भी तो सुनू, सोचूँ, समझूँ, फिर करूँ प्रतिकार।
उसने कड़क कर कहा,
मुझे हर हाल में प्रतिज्ञा निभाना है।
इक्कीसवीं सदी के ‘एड्स युग’ से स्वयं को बचाना है।
देखता हूँ यह समाज मुझे कैसे नचायेगा।
जोर ज़बरदस्ती की तो खुद भी पछतायेगा।
इतना नाचूँगा कि सृष्टि में बिखर जाऊँगा।
आने वाली नस्ल भी बर्बाद कर जाऊँगा।
तब देखूँगा कि कौन मुझे नचायेगा।
जब हर इंसान ही घुँघरू बन जायेगा।
सृष्टि से इंसानियत का नामोनिशान मिट जाएगा।
– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश




