मनोरंजन
माँ की डिग्रियाँ – रेखा मित्तल

बिन पूछे ही पढ़ लेती है
मेरे दिल का सारा हाल
बिन बताए ही जान लेती
मेरी भूख का सवाल
कैसे कह दूँ अनपढ़ है मेरी माँ?
चेहरा देखकर ही सब समझ जाती
मेरे दुख, मेरी सारी परेशानी
बिन बोले ही पहचान जाती
मेरे सुख, मेरी हँसी, मेरी कहानी
कैसे कह दूँ अनपढ़ है मेरी माँ?
फोन पर ही सुन आवाज़ मेरी
खूब अनुमान लगा लेती
मेरे बात करने से पहले ही
मेरी रूह को भाँप लेती
कैसे कह दूँ अनपढ़ है मेरी माँ?
बिना स्पर्श किए ही जान जाती
मेरे अंतर्मन के जख्मों को
अपने स्नेह और ममत्व के मरहम
के लेप लगाती मेरी रूह पर
कैसे कह दूं अनपढ़ है मेरी माँ?
-रेखा मित्तल, चण्डीगढ़




