मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

राजे-दिल अब वो बतलाने लगे है,

मसअला पुराना सुलझाने लगे है।

 

मिज़ाजे-मौसम की बात न पूछो,

बादे-शबा आज बहकाने लगे है।

 

उनकी कमी कुछ इस कदर खली,

आबाद से वीरान मयखाने लगे है।

 

मैखाने से चले जो घर की जानिब,

राहगीर पाग़ल सा बतलाने लगे है।

 

उनकी किस-किस बात पे करे यकीं,

उनकी तो हर बात अफसानें लगे है।

 

मयस्सर न हुआ जब सुकूं हमें भी,

निराश दिल को समझाने लगे है।

– विनोद निराश, देहरादून

राजे-दिल – ह्रदय के भेद

मिज़ाजे-मौसम – मौसम का स्वभाव

बादे-शबा – सुबह की ठंडी हवा / पुरवाई

मयखाने – मदिरालय

मैखाने – शराब की दुकान / मदिरालय

जानिब – तरफ / ओर

राहगीर – रास्ते में मिलने वाले लोग

अफसानें – किस्सा / कहानी / कथा / उपन्यास / आख्यायिका

मयस्सर – प्राप्त / उपलब्ध / सुलभ

सुकूं – आराम / सुख / चैन / इतमीनान

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