मनोरंजन

प्रयागराज  सा मन – सविता सिंह

 

प्रयागराज सा संगम मन

कहीं अनकही,

कहीं सिसकती,

अव्यक्त, अभिव्यक्त सी धड़कनें,

अपरिभाषित से एहसासों की,

दबी हुई उन बातों की लहरें

सब बहती हैं इस दिल में,

उद्गम है ये, संगम है ये,

इसीलिए तो प्रयाग है ये।

कुछ इश्क़ अभी-अभी लगे हुआ,

मन कुंभ सा मेले में भीग गया,

तप में, जल में, स्पर्श हवा में

तेरे होने का स्वाद घुल गया।

प्रयागराज सा मन मचल रहा,

इंद्रियों में जैसे शंख बज रहा,

चल आओ न, इस धार में अब,

जहाँ प्रेम, भक्ति संग मिल रहा।

– सविता सिंह ‘मीरा, जमशेदपुर

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button