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भर मुझे भुजबंध सत्वर – अनुराधा पाण्डेय

क्यों भला आबद्ध हों प्रिय !शब्द बोझिल लेखनी में?
आ मुझे हृद से लगा ले, है सहज यदि नेह कविवर !
व्यंजना में है न बल जो,
चेतना को स्निग्ध गति दे ।
सार्थक हो कुछ प्रणय पथ ,
आज आकर प्रीत रति दे ।
साथ अधरों को मिलाकर—
गान गाएँ वंद्य सस्वर।
है सहज यदि नेह कविवर!
दे सके तो पास आकर ,
प्रेम का अनुवाद दे जा ।
नृत्यमय हो रूक्ष जीवन ,
रंगमय अनुनाद दे जा ।
सद्य तो कर लें निशा भर….
कुछ अमर संवाद प्रियवर !
है सहज यदि नेह कविवर!
चंद पल का खेल जीवन ,
क्यों न जी लें प्रीत रंजित।
आत्मा अम्लान रस से ,
क्यों रहें प्रिय !आज वञ्चित।
चेतना आधार तन को….
मान दे क्षण , देह नश्वर ।
है सहज यदि नेह कविवर!
– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली



