संघ शक्ति कलौ युगे – डॉ. सुधाकर आशावादी

utkarshexpress.com – युग परिवर्तन में देश, काल और परिस्थिति के अनुसार उद्देश्यों की व्याख्या करते हुए सूत्र मंत्र प्रचलित है-
त्रेतायां मंत्र-शक्तिश्च ज्ञानशक्तिः कृते-युगे।
द्वापरे युद्ध-शक्तिश्च, संघशक्ति कलौ युगे।।
जिसका अर्थ है – सत्ययुग में ज्ञान शक्ति, त्रेता में मन्त्र शक्ति तथा द्वापर में युद्ध शक्ति का बल था। किन्तु कलियुग में संगठन की शक्ति ही प्रधान है। मानवीय दृष्टिकोण से समाज का विकास करना, व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़कर वसुधैव कुटुंबकम की भावना से समाज के अंतिम व्यक्ति तक अंत्योदय के प्रति समर्पित भाव से जाति , पंथ की संकीर्णता से उबर कर राष्ट्र निर्माण की दिशा में गतिशील बने रहना भागीरथी कार्य है। ऐसे में दूरदर्शिता पूर्ण दीर्घ चिन्तन करके विघटनकारी तत्वों से राष्ट्र को बचाने के लिए सामाजिक समरसता बनाए रखने के प्रति जनमानस समर्पित रहे , भारतीय परिवार प्रणाली के आत्मीय स्वरूप कुटुंब प्रबोधन की परिकल्पना को सार्थक करने के लिए जनमानस कृत संकल्पित हो , पर्यावरण को संरक्षित करके देश को जल, वायु, ध्वनि प्रदुषण से मुक्त करके स्वस्थ व निरोगी जीवन की दिशा में सम्पूर्ण समाज कार्य करे, भारतीय संस्कार, भारतीय संस्कृति, भारतीय दर्शन का अनुपालन करके स्वदेशी आचरण अपनाएं, अपने उपलब्ध संसाधनों को अपनी आजीविका का माध्यम बनाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में देश अग्रसर हो तथा अपने राष्ट्र की एकता, अखंडता, व समृद्धि के लिए प्रत्येक नागरिक अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहे तथा परिवार, जाति, धर्म व सम्प्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि मानें ।
ऐसे विचार के आधार पर गतिशील विश्व के प्रमुख संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सौ वर्ष पूर्ण होने पर जनमानस इतना तो कर ही सकता है, कि लोकोपयोगी विचारों का अनुपालन करके राष्ट्र निर्माण के प्रति अपने नागरिक कर्तव्यों की पूर्ति करे। (विनायक फीचर्स)




