धर्म

. चाँद और हमारी आस्था – ऋतु गुलाटी

utkarshexpress.com – रात के शांत आकाश में चमकता चाँद सदियों से मानव हृदय का आकर्षण रहा है। उसकी कोमल शीतल किरणें न केवल धरती को आलोकित करती हैं, बल्कि मनुष्य के मन को भी शांति और सौम्यता से भर देती हैं। भारतीय संस्कृति में चाँद केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और पवित्रता का प्रतीक है।
धार्मिक दृष्टिकोण से चाँद.- हिन्दू धर्म में चंद्रमा को देवताओं में एक देवता माना गया है — जिन्हें “सोमदेव” के नाम से जाना जाता है। पुराणों के अनुसार, चंद्रमा को ब्रह्मा ने समुद्र मंथन से उत्पन्न किया था। वे शीतलता और मन की शांति के देवता माने जाते हैं।
श्रावण मास में सोमवारी व्रत, करवा चौथ, शरद पूर्णिमा, रक्षाबंधन, होली और दीपावली जैसे अनेक पर्व चाँद के दर्शन या चंद्र तिथि से जुड़े हैं। विशेषकर करवा चौथ में जब स्त्रियाँ चाँद को छलनी से निहारकर व्रत खोलती हैं, तब वह क्षण आस्था और प्रेम का अद्भुत संगम बन जाता है।
संस्कृति और लोकजीवन में चाँद. – भारतीय लोकगीतों, कविताओं और कहानियों में चाँद का उल्लेख अक्सर प्रियतम के प्रतीक के रूप में हुआ है।
माँ अपने बच्चों को सुलाने के लिए गाती है — “चंदा मामा दूर के…”
कवि प्रेम की उपमा देते हैं — “तेरे मुखड़े पे चाँद की रौनक…”
चाँद यहाँ केवल आकाश का एक पिंड नहीं, बल्कि भावनाओं का साथी, स्मृतियों का दर्पण और सपनों का साथी है।
वैज्ञानिक दृष्टि से चाँद – चाँद पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है, जो हमारे ग्रह के ज्वार-भाटे को नियंत्रित करता है और जलवायु संतुलन में भूमिका निभाता है। विज्ञान ने चाँद तक पहुँचने की कहानी लिख दी, परन्तु आज भी जब पूर्णिमा की रात होती है, तो हर मनुष्य के भीतर कोई न कोई अदृश्य आस्था की लहर उठती है।
आस्था और सौंदर्य का संगम चाँद..- चाँद की शीतल चाँदनी हमें यह सिखाती है कि तेज होना जरूरी नहीं, प्रकाशमय होना जरूरी है।
जैसे चाँद अपनी रोशनी से अंधकार को मिटाता है, वैसे ही मनुष्य को भी अपने सद्गुणों से संसार में शांति और प्रकाश फैलाना चाहिए।
इसलिए भारतीय संस्कृति में चाँद केवल देखने की वस्तु नहीं — बल्कि आत्मिक संतुलन, प्रेम और भक्ति का प्रतीक है।
निष्कर्ष यही है – .चाँद हमारे जीवन में प्रकृति और आध्यात्मिकता का सेतु है। विज्ञान ने उसकी दूरी माप ली, पर मनुष्य के दिल में उसकी जगह अनंत है।
आस्था का चाँद हमेशा हमारे मन आकाश में यूँ ही शीतलता और उजास बिखेरता रहेगा।
-रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़

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