मनोरंजन

गहराई – दीपक राही

 

गड्ढों की गहराई

नहीं मापी जाती

सिर्फ़ इंच-टेप से।

 

कभी-कभी

वो निगल जाते हैं…

एक पूरी उम्मीद

स्कूल जाते बच्चे की,

या दवा लाते बाप की साइकिल।

 

गहराई सिर्फ शब्दों

में नहीं होती,

वो छिपीं होती है

आर्थिक संकटों के भीतर…

जो पूरी की पूरी

अर्थव्यवस्था ही

निगल जाते है।

 

गहराई सिर्फ विचारों

में नहीं होती।

वो पाई जाती है

अमीर और गरीब के बीच…

हर दिन गहराते

फासलों में।

 

गहराई

सिर्फ़ धरती में नहीं होती,

वो होती है

नज़रों के नीचे

बेहिस शासन की

चुप्पी में ।

 

कभी बैठो

और सोचो…

किस गहराई तक गिरे हैं हम?

यहाँ मौत…

एक गड्ढे की रिपोर्ट से भी

हल्की मानी जाती है।

– दीपक राही,

आर एस पुरा सेक्टर,

जम्मू (जे एंड के)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button