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मैं हूँ पुरुष – सुनील गुप्ता

 

( 1 ) मैं हूँ पुरुष

एक अदना सा,

हैं मेरी भी कुछ ख्वाहिशें  !!

 

( 2 ) खड़ा वृक्ष सा

हूँ तना-तना,

जड़ें मेरी, धरा में नीचे !!

 

( 3 ) उम्मीदें हूँ पाले

परवाज़ भरूँ ऊँची,

पर पा न सकूँ, मुकम्मल सपने !!

 

( 4 ) है प्रकृति पुरुष

संबंध कुछ ऐसा,

कि, कभी न दोनों एक साथ चलें !!

 

( 5 ) करे जो सवारी

एक साथ दोनों की,

डूबे ग़फ़लत में, निश्चित मरे !!

 

( 6 ) रहे अपने में

‘ स्व ‘, में बना सदैव,

वही पुरुष, कामयाब हो  !!

 

( 7 ) चले जो दिखावे

यहाँ पर पौरुष,

अहं में गिरता, वो वजूद खोए  !!

 

( 8 ) गर छोड़ते चले

पुरुष अपनी प्रकृति,

तो वह ‘घाट का न घर का’, रहे !!

– सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान

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