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अमर ये ऋचाएँ – अनुराधा पाण्डेय

 

कहो ! क्या कलम चाँदनी में भिगोकर

सतत लिख रहे हो अमर ये ऋचाएँ ?

हृदय की व्यथा में शहद घोल कर री!

लगे है लिखी आँसुओं की कहानी ।

लगी ज्यों सजी है लड़ी आँसुओं की,

कहो और कितनी व्यथा है सुनानी?

किसी को लगा, मात्र दो बूँद पानी,

मुझे तो दिखी, मूर्त सी वेदनाएँ।

सतत लिख रहे हो अमर ये ऋचाएँ….

नहीं पृष्ठ पर ये लिखे हर्फ भर हैं,

सतत मूर्त हो शब्द संवाद करते ।

पढूं जब इन्हें शब्द उर मे उतरते,

मुझे ही लगे नित्य अनुवाद करते ।

बताओ मुझे भी मदन ! सद्य इतना –

कहाँ से मिली ये मृदुल कल्पनाएँ?

सतत लिख रहे हो, अमर ये ऋचाएँ….

अगर जो रुधिर उर टपकता नहीँ तो,

करुण आज इतनी न होती कथा भी

अगर प्राण में वेदना रस नहीं तो –

कहाँ मूर्त होती हृदय की व्यथा भी ।

लगे शब्द सारे रुदन कर रहें हो –

सुनाते-लगे है जगत की व्यथाएँ….

सतत लिख रहे हो, अमर ये ऋचाएँ….

बिना साधना के बिना अर्चना के

सहज लिख रहे हो अमर गीत मदने !

नहीं कर्म लाघव न जड़ चाहना है,

महज उर बसा है मृदुल प्रीत मदने !

प्रणय मूर्त ही हो गये हो लगे ज्यों-

तभी दिख रही ये अमर व्यंजनाएँ।

सतत लिख रहे हो, अमर ये ऋचाएँ…..

तुझी को निहारूँ, तुझे ही पुकारूँ

सतत नाम तेरा हृदय में उतारूँ ।

सुनो ! आज करती हृदय से निवेदन,

अभी पास आ ! दो घड़ी तो निहारूं।

नहीं आज मुझको तनिक डर जगत का –

कुटिल देखकर मैं थकी वंचनाएँ।

सतत लिख रहे हो अमर ये ऋचाएँ……

– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, नई दिल्ली

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