मनोरंजन
ग़ज़ल – रुचि मित्तल

ज़िन्दगी तुझसे निभाना आ गया
ज़ख़्म खा के मुस्कुराना आ गया।
ठान कर निकली जो अपने दर से मैं
ठोकरों में ये ज़माना आ गया।
मेरी सोहबत का असर ऐसा हुआ
तुझ को हर वादा निभाना आ गया।
मेरा आँचल जब उड़ा आकाश में
झूम कर मौसम सुहाना आ गया।
खोल कर तू देख दिल के द्वार को
तेरे दर पर ये दीवाना आ गया।
जब से तेरी बज़्म में रुसवा हुए
शायरी से दिल लगाना आ गया।
प्यार का इक़ दीप तुझसे न जला
तुझको मेरा दिल जलाना आ गया।
©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा



