अमेरिकी हितों के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो गया है भारत का साथ – डॉ. शैलेश शुक्ला

utkarshexpress.com – अमेरिका के लिए भारत के साथ अच्छे संबंधों का महत्व केवल व्यापार, हथियारों की खरीद या राजनीतिक मित्रता तक सीमित नहीं है। बदलती दुनिया में भारत अमेरिका की आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत के लिए भी अमेरिका के साथ अच्छे संबंध जरूरी हैं, लेकिन इस साझेदारी का महत्व समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि भारत आज अमेरिकी हितों के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है और आने वाले वर्षों में दोनों देशों के संबंध किस दिशा में जा सकते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच संबंधों का सबसे बड़ा आधार उनके व्यापक आर्थिक हित हैं। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। यहां तेजी से बढ़ता उपभोक्ता वर्ग, बड़ी संख्या में युवा और लगातार विस्तार करता डिजिटल बाजार मौजूद है। अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत केवल सामान बेचने का बाजार नहीं, बल्कि निवेश, उत्पादन, अनुसंधान और नई सेवाओं के विकास का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। विमानन, चिकित्सा उपकरण, कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, ऊर्जा, कृषि तकनीक और औद्योगिक मशीनों जैसे क्षेत्रों में भारत अमेरिकी कंपनियों को बड़े अवसर प्रदान कर सकता है।
भारत की आर्थिक प्रगति अमेरिका के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भर रहना कंपनियों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। भारत में निवेश बढ़ाकर अमेरिकी कंपनियां अपने कारोबार का विस्तार कर सकती हैं और एशिया के दूसरे बाजारों तक पहुंच बना सकती हैं। भारत में उत्पादन और सेवाओं का विकास अमेरिकी कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, अमेरिकी निवेश से भारत में रोजगार, तकनीकी प्रशिक्षण और औद्योगिक विकास को गति मिल सकती है। इस प्रकार दोनों देशों के आर्थिक हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी इस साझेदारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और तकनीकी पेशेवर लंबे समय से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं। भारतीय मूल के अनेक विशेषज्ञ अमेरिकी विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और बड़ी तकनीकी कंपनियों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हैं। इस सहयोग से अमेरिका को कुशल प्रतिभा मिलती है, जबकि भारत को रोजगार, निवेश, अनुभव और वैश्विक तकनीकी विकास से जुड़ने के अवसर प्राप्त होते हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेजी से बढ़ते प्रभाव ने इस संबंध को और महत्वपूर्ण बना दिया है। अमेरिका के पास अग्रणी तकनीकी कंपनियां, बड़ी निवेश क्षमता और उन्नत अनुसंधान संस्थान हैं। भारत के पास विशाल डिजिटल बाजार, तकनीकी प्रतिभा, बहुभाषी समाज और बड़े स्तर पर डिजिटल सेवाएं विकसित करने का अनुभव है। यदि दोनों देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्धचालक चिप, क्वांटम तकनीक, जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अनुसंधान में सहयोग बढ़ाते हैं, तो उन्हें एक-दूसरे की क्षमताओं का लाभ मिल सकता है।
फरवरी 2025 में भारत और अमेरिका ने महत्वपूर्ण तथा उभरती तकनीकों में सहयोग बढ़ाने के लिए ट्रस्ट पहल की घोषणा की थी। इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्धचालक, क्वांटम तकनीक, ऊर्जा, अंतरिक्ष और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों को महत्व दिया गया। इन क्षेत्रों में साझेदारी अमेरिका को विश्वसनीय तकनीकी सहयोग उपलब्ध करा सकती है। भारत के लिए इससे आधुनिक तकनीक, अनुसंधान, निवेश और घरेलू विनिर्माण के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, इस सहयोग की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तकनीक का हस्तांतरण, निवेश और अनुसंधान कितना आगे बढ़ता है।
अमेरिका के लिए भारत का दूसरा बड़ा महत्व सुरक्षा से जुड़ा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति ने अमेरिकी रणनीति को प्रभावित किया है। इस क्षेत्र से दुनिया का बड़ा व्यापार गुजरता है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कारोबार की निरंतरता अनेक देशों के लिए आवश्यक है। हिंद महासागर में भारत की भौगोलिक स्थिति और उसकी नौसैनिक क्षमता उसे क्षेत्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण भागीदार बनाती है। भारत के साथ सहयोग से अमेरिका को समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, समुद्री डकैती की रोकथाम और आतंकवाद के विरुद्ध प्रयासों में सहायता मिल सकती है।
लेकिन भारत को केवल चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के साधन के रूप में देखना अमेरिकी नीति की बड़ी भूल होगी। भारत की अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताएं, आर्थिक प्राथमिकताएं और स्वतंत्र विदेश नीति है। वह किसी एक महाशक्ति के निर्देशों के अनुसार अपने अंतरराष्ट्रीय संबंध तय नहीं करना चाहता। भारत अमेरिका के साथ सहयोग करता है, लेकिन रूस, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ भी संबंध बनाए रखता है। अमेरिका को भारत की इस स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा। मजबूत साझेदारी दबाव से नहीं, बल्कि विश्वास और साझा हितों से बनती है।
रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग के व्यापक अवसर हैं। संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा उपकरणों की खरीद, सैन्य अधिकारियों के बीच संपर्क और तकनीकी सहयोग ने संबंधों को मजबूत किया है। अमेरिकी रक्षा कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है, जबकि भारत को आधुनिक तकनीक और उपकरणों से अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। फिर भी, भविष्य में सहयोग का उद्देश्य केवल हथियारों की खरीद-बिक्री नहीं होना चाहिए। संयुक्त अनुसंधान, भारत में रक्षा उपकरणों का उत्पादन और तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान दोनों देशों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और बिजली की लगातार जरूरत है। अमेरिका अपने ऊर्जा उत्पादों के लिए भारतीय बाजार में अवसर देखता है। भारत के लिए भी विभिन्न देशों से ऊर्जा प्राप्त करना उपयोगी है, क्योंकि इससे किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम हो सकती है। हालांकि, भारत अपनी ऊर्जा नीति केवल अमेरिकी अपेक्षाओं के आधार पर निर्धारित नहीं कर सकता। तेल की कीमत, आपूर्ति की विश्वसनीयता और घरेलू महंगाई पर प्रभाव उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि अमेरिका भारत को अधिक ऊर्जा बेचना चाहता है, तो उसे प्रतिस्पर्धी कीमतों और भरोसेमंद आपूर्ति की व्यवस्था करनी होगी।
दोनों देशों के संबंधों का मानवीय पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिका में भारतीय मूल के लाखों लोग रहते हैं। वे चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, व्यापार, सूचना प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक जीवन में योगदान देते हैं। इस समुदाय ने दोनों देशों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क को मजबूत किया है। भारतीय विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए अमेरिकी विश्वविद्यालयों में शिक्षा तथा अनुसंधान के अवसर महत्वपूर्ण हैं। वहीं, अमेरिकी संस्थानों को भारतीय प्रतिभा से लाभ मिलता है। इसलिए वीजा, विद्यार्थियों की आवाजाही और कुशल पेशेवरों के रोजगार से जुड़े प्रश्न भी द्विपक्षीय संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
व्यापार दोनों देशों की मित्रता की सबसे बड़ी कसौटियों में से एक है। भारत अमेरिकी बाजार में दवाएं, कपड़े, इंजीनियरिंग उत्पाद और अनेक सेवाएं उपलब्ध कराता है। अमेरिका से भारत ऊर्जा उत्पाद, मशीनें, विमान और तकनीकी उपकरण खरीदता है। दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ने से कंपनियों को नए बाजार मिल सकते हैं और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। लेकिन व्यापारिक संबंधों में मतभेद भी स्वाभाविक हैं। अमेरिकी सरकार अपने किसानों, उद्योगों और कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना चाहती है। भारत भी अपने किसानों, छोटे उद्योगों और घरेलू रोजगार को सुरक्षित रखना चाहता है।
कृषि उत्पादों पर शुल्क, बाजार तक पहुंच, डिजिटल कारोबार के नियम और औद्योगिक वस्तुओं के आयात जैसे विषयों पर दोनों देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं। इसलिए किसी व्यापार समझौते की सफलता केवल उसकी घोषणा से नहीं मापी जानी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि उससे व्यापार कितना बढ़ता है, निवेश कितना आता है और दोनों देशों के नागरिकों तथा उद्योगों को कितना लाभ मिलता है। ऐसा समझौता जो केवल एक पक्ष की मांगों को पूरा करे, लंबे समय तक संबंधों को मजबूत नहीं बना सकता।
अमेरिका को भारत के साथ संबंध मजबूत करते समय लोकतंत्र, मानवाधिकार और संस्थाओं से जुड़े प्रश्नों पर भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इन विषयों पर खुली बातचीत आवश्यक है, लेकिन संवाद में आपसी सम्मान बना रहना चाहिए। मतभेदों को स्वीकार करना और उनके समाधान का प्रयास करना किसी भी परिपक्व साझेदारी की पहचान है। आर्थिक या रणनीतिक हितों के कारण सभी असहमतियां समाप्त नहीं हो जातीं, लेकिन समझदारी से बातचीत करने पर सहयोग के रास्ते खुले रह सकते हैं।
आज अमेरिका के सामने वैश्विक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी बदलाव, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता जैसी अनेक चुनौतियां हैं। इन परिस्थितियों में भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है। भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, युवा प्रतिभा, तकनीकी क्षमता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी भूमिका अमेरिका को अनेक अवसर प्रदान करती है। दूसरी ओर, भारत को अमेरिकी निवेश, अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और बड़े बाजार से लाभ मिल सकता है।
अमेरिका के लिए भारत का साथ इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत केवल वर्तमान का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में प्रभावशाली भूमिका निभाने की क्षमता रखने वाला देश है। इस क्षमता का लाभ तभी मिल सकता है, जब दोनों देश एक-दूसरे को बराबरी का साझेदार मानें। अमेरिका को भारत से सहयोग की अपेक्षा रखते हुए उसकी स्वतंत्रता और प्राथमिकताओं का सम्मान करना होगा। भारत को भी अपने हितों की रक्षा करते हुए सहयोग के अवसरों का समझदारी से उपयोग करना चाहिए। संबंधों की स्थिरता किसी एक नेता, समझौते या संकट पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। विश्वास, विकास और सम्मान पर आधारित साझेदारी ही दोनों देशों को लंबे समय तक लाभ पहुंचा सकती है। यही भारत का साथ अमेरिका की ताकत बनने का वास्तविक आधार है। (विभूति फीचर्स)




