आईएएस-एचसीएस की सफलता: प्रतिभा की परीक्षा या संसाधनों की ताकत? – डॉ. सत्यवान सौरभ

utkarshexpress.com – भारतीय समाज में आईएएस और एचसीएस जैसी प्रशासनिक सेवाओं में चयन को प्रतिभा, परिश्रम, अनुशासन और मेधा की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। इन सेवाओं में पहुँचने का सपना लाखों युवा देखते हैं, लेकिन सफलता कुछ ही अभ्यर्थियों को मिल पाती है। इस लंबी प्रतिस्पर्धा के बीच एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या इन परीक्षाओं में केवल प्रतिभा और मेहनत निर्णायक होती हैं, या अभ्यर्थी की पारिवारिक पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति और सामाजिक संसाधन भी उसकी सफलता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए, तो प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में मौजूद अवसरों की असमानता के कई पहलू सामने आते हैं।
जब किसी एचसीएस या आईएएस टॉपर की सफलता की कहानी सामने आती है, तो उसके अंकों, रैंक, मेहनत और संघर्ष की चर्चा होती है। कई बार यह जानकारी भी सामने आती है कि अभ्यर्थी कई वर्षों से तैयारी कर रहा था या अनेक बार संघ लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा तक पहुँचा। उदाहरण के लिए, यदि कोई अभ्यर्थी छह बार आईएएस की मुख्य परीक्षा में शामिल होने के बाद भी प्रयास जारी रखता है और अंततः राज्य की प्रशासनिक सेवा में सफलता प्राप्त करता है, तो उसकी मेहनत निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। लेकिन इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी उठता है—क्या प्रत्येक प्रतिभाशाली युवा को इतने लंबे समय तक तैयारी जारी रखने का अवसर मिल पाता है? इस प्रश्न का उत्तर केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति में तलाशना उचित नहीं होगा। तैयारी के लिए समय चाहिए, आर्थिक सुरक्षा चाहिए और असफलताओं के बाद दोबारा खड़े होने का अवसर भी चाहिए। किसी अभ्यर्थी के परिवार के पास पर्याप्त संपत्ति हो, माता-पिता अच्छी नौकरी में हों या परिवार की नियमित आय इतनी हो कि कई वर्षों तक पढ़ाई का खर्च उठाया जा सके, तो उस अभ्यर्थी को तैयारी के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल परिस्थितियाँ मिल सकती हैं। इसके विपरीत, आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का युवा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हुए भी घर की जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो पाता। उसे किताबों, कोचिंग और परीक्षा के खर्च की व्यवस्था करने के साथ-साथ परिवार की आजीविका के बारे में भी सोचना पड़ता है।
यहीं से अवसरों की असमानता का प्रश्न जन्म लेता है। – मान लीजिए, दो युवा समान प्रतिभाशाली हैं। दोनों की शैक्षणिक क्षमता भी लगभग समान है। पहले युवा के परिवार के पास पर्याप्त संपत्ति है। उसके रहने, खाने, पढ़ने और परीक्षा देने का खर्च परिवार उठा सकता है। वह लगातार पाँच या छह वर्षों तक अपनी तैयारी पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। दूसरी ओर, दूसरे युवा के पिता किसान, मजदूर या छोटे कर्मचारी हैं। परिवार की आय सीमित है और घर में उसके अलावा भी कई लोगों की जिम्मेदारियाँ हैं। वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, लेकिन कुछ समय बाद उसे नौकरी करने या परिवार की आर्थिक सहायता के लिए दूसरा रास्ता तलाशना पड़ता है। दोनों के बीच अंतर केवल प्रतिभा का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का भी है जिनमें उनकी प्रतिभा विकसित होती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए केवल पाठ्यक्रम पढ़ लेना पर्याप्त नहीं होता। नियमित अध्ययन, समसामयिक घटनाओं की जानकारी, उत्तर लेखन का अभ्यास, वैकल्पिक विषय की तैयारी, साक्षात्कार की समझ और लगातार अपनी कमियों को सुधारने की आवश्यकता होती है। कई अभ्यर्थी महँगी कोचिंग, अच्छे पुस्तकालय, अनुभवी शिक्षकों के मार्गदर्शन और जानकार लोगों के संपर्क से लाभ उठाते हैं। दूसरी ओर, अनेक युवा इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री, पुरानी पुस्तकों और सीमित संसाधनों के सहारे तैयारी करते हैं। डिजिटल माध्यमों ने अध्ययन सामग्री तक पहुँच आसान जरूर की है, लेकिन शांत वातावरण, उचित मार्गदर्शन और आर्थिक सुरक्षा का महत्त्व समाप्त नहीं हुआ है।
यहाँ एक बात स्पष्ट होनी चाहिए कि संपन्न परिवार से आने वाला प्रत्येक अभ्यर्थी सुविधाओं के कारण ही सफल होता है, ऐसा कहना गलत होगा। प्रशासनिक सेवाओं में चयनित अनेक युवा कठिन परिस्थितियों से निकलकर भी सफलता प्राप्त करते हैं। दूसरी तरफ, आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के अनेक अभ्यर्थी भी असफल होते हैं। सफलता के लिए परिश्रम, बौद्धिक क्षमता, निरंतरता, परीक्षा की समझ और मानसिक दृढ़ता आवश्यक हैं। इसलिए बहस का उद्देश्य किसी सफल अभ्यर्थी की उपलब्धि को कमतर आँकना नहीं, बल्कि यह समझना होना चाहिए कि अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में रहने वाले युवाओं को तैयारी के कितने समान अवसर मिलते हैं।
इसी प्रकार, किसी अभ्यर्थी के माता-पिता का उच्च पद पर कार्यरत होना या परिवार का राजनीति में सक्रिय होना अपने आप में अनुचित लाभ का प्रमाण नहीं है। ऐसे परिवारों में प्रशासनिक व्यवस्था की समझ, बेहतर शैक्षणिक मार्गदर्शन और प्रेरणा का वातावरण उपलब्ध हो सकता है। लेकिन केवल पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर किसी की योग्यता पर संदेह करना भी उचित नहीं है। आवश्यक यह है कि इस विषय पर धारणाओं के बजाय प्रमाणों के आधार पर चर्चा की जाए।
यदि यह जानना है कि आईएएस और एचसीएस में सफल होने वाले अभ्यर्थियों में संपन्न परिवारों से आने वालों का अनुपात कितना है, तो इसके लिए व्यवस्थित अध्ययन की आवश्यकता होगी। चयनित अभ्यर्थियों की पारिवारिक आय, माता-पिता के व्यवसाय, ग्रामीण या शहरी पृष्ठभूमि, शिक्षा पर हुए खर्च, तैयारी में लगे वर्षों और उपलब्ध मार्गदर्शन जैसे पहलुओं का विश्लेषण किया जाना चाहिए। बिना विश्वसनीय आँकड़ों के यह दावा करना कि 99.99 प्रतिशत सफल अभ्यर्थी संपन्न परिवारों से आते हैं, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इस दावे के पीछे छिपे अवसरों की असमानता संबंधी प्रश्न को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार और संबंधित संस्थाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को अधिक समावेशी बनाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण निःशुल्क मार्गदर्शन, जिला स्तर पर आधुनिक पुस्तकालय, डिजिटल अध्ययन केंद्र, उत्तर लेखन का अभ्यास, अनुभवी शिक्षकों का मार्गदर्शन और जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए पारदर्शी आर्थिक सहायता उपयोगी हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले युवाओं को भी वही शैक्षणिक संसाधन और जानकारी मिलनी चाहिए, जो बड़े शहरों में तैयारी करने वालों को उपलब्ध होती है। साथ ही, सहायता योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद विद्यार्थियों तक पहुँचे, इसके लिए नियमित समीक्षा भी जरूरी है।
प्रशासनिक सेवाओं में चयनित अधिकारी भविष्य में समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याओं को समझने और उनके समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह भी आवश्यक है कि इन सेवाओं तक पहुँचने के रास्ते सामाजिक विविधता और समान अवसरों को प्रोत्साहित करें। परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी तैयारी के अवसरों को व्यापक बनाना भी है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि संपन्न परिवारों के बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में क्यों सफल होते हैं। सवाल यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए किन बाधाओं से गुजरना पड़ता है। किसी युवा को छह बार मुख्य परीक्षा में बैठने का अवसर मिलना उसकी निरंतरता और मेहनत का परिचायक हो सकता है, लेकिन हर युवा को ऐसा अवसर उपलब्ध नहीं होता। कोई आर्थिक मजबूरी के कारण पहले ही प्रयास के बाद नौकरी करने लगता है, तो कोई परिवार की जिम्मेदारियों के कारण तैयारी छोड़ देता है।
प्रतिभा किसी वर्ग, जाति, गाँव, शहर या आर्थिक स्थिति की बपौती नहीं है। अवसरों का विस्तार ही प्रतिभा को सामने लाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। प्रशासनिक सेवाओं की वास्तविक निष्पक्षता केवल इस बात से नहीं आँकी जानी चाहिए कि परीक्षा कितनी पारदर्शी है, बल्कि इस बात से भी कि समाज के विभिन्न वर्गों के युवाओं को उस परीक्षा तक पहुँचने और उसकी तैयारी करने के कितने अवसर उपलब्ध हैं। जब किसी गरीब परिवार का प्रतिभाशाली युवा भी आर्थिक मजबूरियों के दबाव में आए बिना अपनी क्षमता के अनुसार तैयारी कर सकेगा, तभी योग्यता और अवसर के बीच की दूरी वास्तव में कम होगी
– डॉo सत्यवान सौरभ, 333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045, मोबाइल :9466526148,01255281381



