जब भी सितम्बर आता है – विनोद निराश

जब-जब सितम्बर आता है,
एक अलग अनुभूति दिलाता है,
मन पुलकित हो जाता है,
सब कुछ नया सा हो जाता है,
जब-जब सितम्बर आता है।
बहुत याद आता है नौवा महीना,
जन्म देने वाला कहूँ,
या दुनियाँ दिखाने वाला,
अवतरण की याद दिलाता है,
जब-जब सितम्बर आता है।
बरसात का गमन,
गुलाबी सर्दी का आगमन,
मन में अनेको अभिलाषाएं समेटे,
ऋतु-संधि का अहसास कराता है।
जब-जब सितम्बर आता है।
कभी नभ में स्याह बादल,
कभी रिमझिम सी फुहारें,
कभी भीगता बदन बारिस से,
स्मृतियोँ में मुझको बाँध जाता है।
जब-जब सितम्बर आता है।
बारिस के बाद निखरती पर्वत श्रृंखलाएं,
नभ में दमकते धवल बादल,
नीलाम्बर में चमकता इंद्रधनुष,
कैसे-कैसे ख्याल जगा जाता है,
जब-जब सितम्बर आता है।
अंगड़ाई लेती कलियाँ,
अनवरत मचलती बल्लरियाँ,
झूमती तरु-शाखाएँ देख,
आवारा भ्रमर गुनगुनाता है।
जब-जब सितम्बर आता है।
जन्म दिन के बहाने जब तुमने,
हौले से कानो में फुसफुसाते हुए,
गाल पर एक चुंबन अंकित कर दिया था,
आज भी तुम्हारी याद दिला जाता है,
जब-जब सितम्बर आता है।
तन्हाई का ये सितम्बर माह,
मन में पनपती अगणित चाह,
एकाकी स्वप्नों में ख्याली आगमन,
बस तेरा दीदार हो जाता है,
जब-जब सितम्बर आता है।
उम्र का ये आखिरी सा पड़ाव,
भरे घर में महसूस होता अदृश्य अभाव,
लम्हा-दर-लम्हा इक रोज़ कम होता ज़िंदगी का,
तेरी बे-मौजूदगी का किस्सा सुना जाता है,
जब-जब सितम्बर आता है।
सब कुछ तो है निराश अहसासों में,
इक कमी खलती है बातों बातों में,
रात है, तन्हाई है, बस तू नहीं मगर,
टूटता तारा तेरा अहसास करा जाता है,
जब-जब सितम्बर आता है।
– विनोद निराश देहरादून (स्वरचित)
(30 सितम्बर 2026 – बुधवार)




