डिजिटल युग में निजता: अधिकार और बढ़ती चुनौतियाँ – डॉ. सत्यवान सौरभ

utkarshexpress.com – आज मनुष्य की डिजिटल पहचान उसके भौतिक अस्तित्व जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। हम क्या खोजते हैं, कहाँ जाते हैं, क्या खरीदते हैं, किन लोगों से संवाद करते हैं और किन विषयों में रुचि रखते हैं—इन सबका एक डिजिटल निशान पीछे छूटता जाता है। ऐसे में प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमारी जानकारी किसके पास है, बल्कि यह भी है कि उस जानकारी पर हमारा कितना नियंत्रण है। इसी संदर्भ में डिजिटल युग में निजता का प्रश्न व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और स्वायत्तता से जुड़ी एक गंभीर संवैधानिक और सामाजिक चुनौती बनकर उभरा है।
निजता व्यक्ति का वह अधिकार है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तिगत जानकारी, पहचान और निजी जीवन तक दूसरों की पहुँच को नियंत्रित करता है। भारत में इस अधिकार को ऐतिहासिक महत्व तब मिला जब सर्वोच्च न्यायालय ने के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में निजता को संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार माना। न्यायालय ने निजता को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा तथा स्वायत्तता से जोड़ा। साथ ही यह स्पष्ट किया कि निजता पर किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप कानून, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता जैसे संवैधानिक मानकों के अनुरूप होना चाहिए। डिजिटल तकनीक के विस्तार ने इस अधिकार का दायरा और उसकी चुनौतियाँ दोनों व्यापक कर दी हैं।
सबसे पहले, राज्य की बढ़ती निगरानी क्षमता निजता के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। चेहरे की पहचान, बायोमेट्रिक पहचान, स्थान की निगरानी और डिजिटल संचार के विश्लेषण जैसी तकनीकें अपराध नियंत्रण तथा राष्ट्रीय सुरक्षा में उपयोगी हो सकती हैं। किंतु यदि इनके प्रयोग पर पर्याप्त कानूनी सीमाएँ और स्वतंत्र निगरानी न हो, तो यही तकनीक व्यापक निगरानी का माध्यम बन सकती है। इसलिए सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन स्थापित करना लोकतांत्रिक शासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
दूसरी ओर, निजी डिजिटल कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर व्यक्तिगत डेटा का संग्रह भी चिंता का विषय है। सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स, सर्च इंजन और मोबाइल एप्लिकेशन हमारे व्यवहार से संबंधित विशाल मात्रा में डेटा एकत्र करते हैं। अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त इन सूचनाओं को जोड़कर व्यक्ति की विस्तृत व्यवहारगत प्रोफाइल तैयार की जा सकती है। इससे सेवाओं को व्यक्तिगत बनाना संभव होता है, लेकिन यही प्रक्रिया उपभोक्ता की पसंद, व्यवहार और निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता भी पैदा करती है। इस प्रकार डेटा केवल सूचना नहीं रह जाता, बल्कि आर्थिक और सामाजिक शक्ति का स्रोत बन जाता है।
निजता का संकट केवल बड़े डेटा-संग्रह तक सीमित नहीं है। डॉक्सिंग जैसी घटनाओं में किसी व्यक्ति का पता, फोन नंबर, तस्वीर या अन्य निजी जानकारी उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक कर दी जाती है। इससे ऑनलाइन उत्पीड़न, धमकी और शारीरिक सुरक्षा के खतरे पैदा हो सकते हैं। इसी प्रकार डीपफेक तकनीक ने पहचान और प्रतिष्ठा के दुरुपयोग को नया आयाम दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से किसी व्यक्ति के चेहरे या आवाज का इस्तेमाल कर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है जो वास्तविक प्रतीत होती है। इससे निजता के साथ-साथ व्यक्ति की गरिमा और प्रतिष्ठा भी प्रभावित हो सकती है।
इसके अतिरिक्त, डेटा उल्लंघन और साइबर हमले नागरिकों की निजता के लिए गंभीर खतरा हैं। वित्तीय जानकारी, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य संवेदनशील सूचनाएँ चोरी होने पर पहचान की चोरी, वित्तीय धोखाधड़ी और ब्लैकमेल जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। समस्या को और जटिल बनाती है एल्गोरिद्मिक प्रोफाइलिंग। जब स्वचालित प्रणालियाँ व्यक्तिगत डेटा के आधार पर लोगों के बारे में निर्णय लेने लगती हैं, तो गलत या पक्षपाती डेटा भेदभावपूर्ण परिणाम उत्पन्न कर सकता है। यदि ऐसी निर्णय-प्रक्रियाएँ पारदर्शी न हों, तो व्यक्ति के लिए अपने विरुद्ध लिए गए निर्णय को समझना या चुनौती देना कठिन हो जाता है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था की एक अन्य विशेषता यह है कि डेटा अब एक ही संस्था तक सीमित नहीं रहता। सरकारें, निजी कंपनियाँ, विज्ञापन एजेंसियाँ, एप डेवलपर, क्लाउड सेवा प्रदाता और तकनीकी विक्रेता किसी व्यक्ति के डेटा की अलग-अलग कड़ियों से जुड़े हो सकते हैं। परिणामस्वरूप डेटा के प्रवाह की पूरी श्रृंखला और जिम्मेदारी तय करना कठिन हो जाता है। सीमा-पार डेटा प्रवाह इस समस्या को और बढ़ाता है, क्योंकि किसी नागरिक की जानकारी एक देश में एकत्र होकर दूसरे देश में संग्रहीत या संसाधित हो सकती है।
निजता की रक्षा में सबसे बड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों में से एक ‘सहमति की थकान’ है। उपयोगकर्ता लंबी और जटिल गोपनीयता नीतियों को पढ़े बिना ‘I Agree’ पर क्लिक कर देते हैं। ऐसी स्थिति में सहमति कानूनी औपचारिकता तो बन जाती है, लेकिन वास्तविक रूप से सूचित विकल्प नहीं रह जाती। दूसरी चुनौती यह है कि तकनीकी नवाचार अक्सर नियमन से तेज गति से आगे बढ़ता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और नई डेटा-विश्लेषण तकनीकें ऐसे जोखिम पैदा कर सकती हैं जिनकी कल्पना मौजूदा कानूनों के निर्माण के समय नहीं की गई थी।
हालाँकि, निजता की रक्षा का अर्थ यह नहीं है कि राज्य की सुरक्षा आवश्यकताओं या तकनीकी नवाचार को पूरी तरह सीमित कर दिया जाए। अपराध, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से निपटने के लिए कुछ परिस्थितियों में सूचना तक पहुँच आवश्यक हो सकती है। चुनौती यह है कि ऐसी शक्तियों का प्रयोग कानूनसम्मत, आवश्यक और आनुपातिक हो तथा उनके दुरुपयोग पर प्रभावी निगरानी और उपचार की व्यवस्था हो।
इस दिशा में भारत ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के माध्यम से महत्वपूर्ण कदम उठाया है। आवश्यकता अब इसके प्रभावी क्रियान्वयन, मजबूत संस्थागत निगरानी और नागरिकों के लिए सरल शिकायत निवारण व्यवस्था की है। साथ ही, ‘प्राइवेसी बाय डिजाइन’ को डिजिटल शासन और निजी क्षेत्र की तकनीकी संरचना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसका अर्थ है कि किसी तकनीक के निर्माण के बाद निजता की सुरक्षा जोड़ने के बजाय शुरुआत से ही डेटा न्यूनतमकरण, सुरक्षित भंडारण, एन्क्रिप्शन और सीमित डेटा-संग्रह जैसे सिद्धांतों को अपनाया जाए।
डिजिटल प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही भी बढ़ाई जानी चाहिए। डॉक्सिंग, डीपफेक और पहचान के दुरुपयोग की शिकायतों के लिए त्वरित तथा सुलभ व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही नागरिकों को डिजिटल साक्षरता के माध्यम से यह समझाना आवश्यक है कि वे अपनी व्यक्तिगत जानकारी को कैसे सुरक्षित रखें। मजबूत पासवर्ड, बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण, गोपनीयता सेटिंग का उचित उपयोग और संदिग्ध लिंक से सावधानी जैसे उपाय व्यक्तिगत सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं।
अंततः, डिजिटल युग में निजता को केवल डेटा की सुरक्षा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता, पहचान और आत्मनिर्णय के अधिकार की रक्षा का प्रश्न है। जिस प्रकार लोकतंत्र में नागरिक को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता आवश्यक है, उसी प्रकार डिजिटल लोकतंत्र में अपने डेटा पर नियंत्रण भी आवश्यक है। अतः भारत को ऐसी डिजिटल व्यवस्था विकसित करनी होगी जहाँ तकनीक शक्ति का माध्यम हो, नियंत्रण का नहीं; डेटा विकास का साधन हो, शोषण का नहीं; और सुरक्षा के साथ नागरिक की स्वतंत्रता तथा निजता भी समान रूप से संरक्षित रहे।
– डॉo सत्यवान सौरभ, 333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी,, हरियाणा – 127045, मोबाइल :9466526148,01255281381


