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दिव्य अनुपम अलौकिक – सविता  सिंह 

ज़ब शशधर की ये प्रथम किरण

ज्यो पड़ती तेरे आनन पर,

फैली फिर धरा के चहुँ ओर

मोहक धवल उजली सी किरण।

देख कर विस्मित होने लगे

सकल चर-अचर, अरु मानव-गण,

मेनका-सी सुंदरता लिए

किसका मोती सम श्वेत वसन?

ज्यों ओस कि बूँदों पर उतरी

सूरज की पहली रक्तिम किरण,

अलौकिक सा अनुपम मनोरम

न शब्दों में इसका वर्णन।

ईर्ष्या में चाँदनी छिप गई

नटखट से बादलों के ओट,

अंधकार को बेध कर व्याप्त

होने लगी हुई श्वेत ज्योत।

सच तो है नारी ही जग की

कोमल विमल अनुपम-सी कृति,

कोई और क्या लिखें उस पर,

नहीं शेष बची कोई पंक्ति।

चाहे दिनकर की प्रथम किरण

या मयंक की हो धवल किरण,

उसकी सौम्यता अरु शुभ्रता का

शब्दों में न हो सके वर्णन।

-सविता  सिंह  मीरा, जमशेदपुर

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