कविता – जसवीर सिंह हलधर

एक रात की बात अनोखा सपना देखा ,
दर्शन के अनुभव ख़ास चरम आनंद रूप ।
वर्षा की रिम झिम बूंदों में आये दिनकर ,
आधी रजनी का समय लगी थी तेज धूप ।।
उड चला भावना की आँधी में बहुत तेज ,
फिर मैं दिनकर के पीछे पीछे दौड़ चला ।
अनुभूति हुई जो मुझको कैसे बतलाऊँ ,
लगता था इस धरती को पीछे छोड़ चला ।।
दिनकर से मैंने कहा सुनो जीवन दाता ,
तुम तो सारे जग को उजियारा देते हो ।
ये भी सच है तुम सबसे बड़े तपस्वी हो ,
धरती पर ही क्यों आग उगलते रहते हो ।।
लेकिन जब मानवता को तपन बांटते हो ,
तब वितरण में क्यों असंतुलन घुल जाता है ।
कुछ लोग जिंदगी भर अंगारों पर चलते ,
पर कुछ को तो फूलों का घर मिल जाता है ।।
मैं तुम पर पक्ष पात का दोष नहीं मढ़ता ,
तुम न्याय क्या धरती के दिनकर को दे पाये ।
सूर्य का कांत निराला मरा गरीबी में ,
जीवन भर अपनी तपन न बापस ले पाये ।।
दिनकर बोले इसमें मेरा कोई दोष नहीं ,
संवेदनशील मनुज भावुक हो जाते हैं ।
पहले तो अधिक ऊर्जा लेते हैं मुझसे ,
फिर जीवन भर जलने का कष्ट उठाते हैं ।।
कुछ कवियों ने भी ये ही पथ तो अपनाया ,
इस लिए जिंदगी भर अंगारों से खेले ।
लेकिन ये भी मत भूलो किसने क्या पाया ,
धरती पर उनकी कविता के अब भी मेले ।।
दिनकर से सुन धरती के दिनकर की गाथा ,
लहरें दिनकर को गंगा पार कराती थीं ।
कुछ शब्द ब्रह्म उसके मन मंदिर में जाते ,
मेरी किरणें ही उनको लेकर के आती थीं ।।
इस जीवन रूपी महासमर में कवियों ने ,
रस भी भोगे थे और कष्ट भी झेला था ।
जीवन भर कविता की सेवा की कवियों ने ,
भटके थे खाली जेब न पास अधेला था ।।
पर मत भूलो जग में जो नाम कमाए हैं ,
कविता ने ही तुलसी भगवान बनाए हैं ।
जीवन भर शब्द साधना की जिन कवियों ने ,
तब ज्ञान पीठ जैसे ऊंचे पद पाए हैं ।।
पिछली सदी में दिनकर ने जो साहित्य लिखा ,
नहीं लगता कोई और कवि लिख पाया है ।
मेरी उपासना के कारण ही तो दिनकर ,
कुरुक्षेत्र सरीखे खंड काव्य रच पाया है ।।
उसी काल का एक उदाहरण और भी है ,
जो राम शक्ति पूजा से नाम कमाया था ।
जीवन भर समर किया जिसने हालातों से ,
अंतिम क्षण तक हालात हरा क्या पाया था ।।
उसका भी था बंकिम जैसा साहित्य सृजन ,
जो भी मन आया मंचों पर वो कह जाता ।
थी एक विदुषी महादेवी वर्मा नामक,
जिसके छंदों से मंचों पर रस बह जाता ।।
कवि श्याम नारायण पांडे को देखो जिसने,
चेतक को घोड़ों का सरदार बनाया हैं ।
हरिओम गरीबों की पीड़ा को गाता है ,
कविता से ही सरकारों को दहलाया है ।।
अब अपनी धरती पर बापिस जाओ” हलधर ,
मेरे पीछे आओगे तो जल जाओगे ।
जय शंकर सा साहित्य रचो बढ़ते जाओ,
कामायनी जैसे महाकाव्य रच पाओगे ।।
इतना समझाकर वेग बढ़ाया दिनकर ने ,
मैंने देखा उसकी गति का कोई पार नहीं ।
मैं क्या करता फिर वसुंधरा पर लौट पड़ा ,
जिससे सुंदर मेरा कोई संसार नहीं ।।
सपने में जो देखा लिखने की हिम्मत की ,
ये सब कुछ मैंने दिनकर से ही पाया है ।
तारा मण्डल में सोभित हैं दोनों दिनकर ,
हरिओम नाम की भी हलधर पर छाया है ।।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून




