मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

गर तू बात करे तो मैं भी बात करूँ,

गर तू करे इशारा तो मुलाक़ात करूँ।

 

इक बार कदम बढ़ा के देख तो सही,

यक़ीनन तेरी जानिब दोनों हाथ करूँ।

 

कभी हक़ से तसव्वुर करके देखना,

कुर्बान तुझ पे अपनी ये हयात करूँ।

 

तू बेशक ज़ख्म पे जख्म दिया कर,

मैं तीरे-नज़र को नज़र से मात करूँ।

 

तेरे गेसूओं की शाम कई बार देखी,

तू कहे तो तेरे पहलू में रात करूँ।

 

वो इस कदर पर्दानशीं हुए निराश,

अब किस से जाके मालूमात करूँ।

– विनोद निराश, देहरादून

जानिब – तरफ / ओर

तसव्वुर – कल्पना / ख्याल / विचार

हयात – जीवन / ज़िंदगी

गेसूओं – बालों / केशो

तीरे-नज़र – नयन बाण / तीखी नज़र / चुभने वाली दृष्टि

मात – पराजित

पर्दानशीं – छुपी हुई / पर्देदार / जो सार्वजानिक न हो

मालूमात – जानकारी / सूचना

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