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ग़ज़ल (हिंदी) – जसवीर सिंह हलधर

उसकी हसीं में दर्द है चेहरा छुपा रहा ।
ईरान भी है ख़ौफ में मुखड़ा बता रहा ।
इस ओर हैं रंगीनियां होली औ ईद की ,
उस ओर तो बारूद का धूँआ चिड़ा रहा ।
अपराध किसका है बताओ कौन तय करे ,
मुखिया धधकती आग में डीजल मिला रहा ।
अब विश्व अपना दर्द ये किससे बयां करे ,
नाटो सियासी जंग के खंजर चला रहा ।
आबोहवा की ताजगी को खा गया है जो ,
वो ही समूचे विश्व को उल्लू बना रहा ।
चिड़िया हमारे बाग की बैचेन हैं बहुत ,
बैठा हुआ है बाज जो नज़रें गढ़ा रहा ।
हरमूज वाले मार्ग में सुख चैन है फंसा,
ख़तरा रसोई गैस का सबको रुला रहा ।
भारत अकेला कर रहा है शांति का जतन ,
‘हलधर’ हमें आँखें खड़ा मुखिया दिखा रहा ।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून



