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दरवाज़ों पर दस्तक देता – डॉ अमित कुमार

दरवाज़ों पर दस्तक देता

गली गली में चलता

थकान को जेब में दबाए

एक BLO निकल पड़ता

किसी की आँखों में

उपेक्षा की परछाई मिलती

किसी की बातों में

तानों की कड़वाहट

फिर भी कदम नहीं रुकते

क्योंकि फ़र्ज़

माथे का तिलक बन जाता

गाँव की मिट्टी

शहर की गलियाँ

हर मोड़ पर

सहयोग की कमी का

घाव मिलता

रिपोर्ट की देरी हो

या दस्तावेज़ों की कतराने की आदत

दोष उसी के सिर आता

जो सुबह से शाम

देश के लोकतंत्र का

धागा सीता रहता

कागज़ के पीछे भागते

फोन की घंटियों में

उम्मीद ढूँढते

बहुत कुछ टूटता है भीतर

पर आवाज़ फिर भी

नरम ही रहती

क्योंकि वह जानता है

सम्मान से बात करना

उसका संस्कार है

और सहयोग मांगना

उसका अधिकार नहीं—

एक विनम्र निवेदन है

लोग कहते—

“पढ़ाई नहीं की, इसलिए BLO बना दिया!”

इन शब्दों की चुभन

कपड़ों से नहीं

दिल से उतरती

पर फ़र्ज़

सबकी चुभन को झेलकर भी

मुस्कान नहीं खोता

और इस सबके बीच

वह उम्मीद रखता है

कि एक दिन

समाज समझेगा—

मतदाता सूची सिर्फ़ कागज़ नहीं

लोकतंत्र की साँस है

और उस साँस को चलाए रखने में

उसका हर कदम

एक सेवा है

आज

उसकी थकान

उसकी चुप्पी

उसका धैर्य

सब सलाम के काबिल है

क्योंकि हर BLO

अपमान के पार जाकर भी

कर्तव्य का दिया

जलाए रखता है

-डॉ अमित कुमार बिजनौरी

बिजनौर, उत्तर प्रदेश

 

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