मनोरंजन

पितर पाख – अशोक यादव

मरे पुरखा मन के बिकट आव-भगत होवत हे,

जियत-जागत मनखे के कोनो नइ हे पुछारी।

सरग के पहुना मन बर बरा अउ चीला बनत हे,

घर के दाई-ददा मन बर नइ हे भात अउ पानी।।

 

गोबर म लिपागे कुरिया के ओरिया अउ परछी,

चाँउर पिसान के चउँक पुरागे सुग्घर सजे सिंगार।

रंग-रंग के फूल-फलेता, पाना दसे हे ओरी-ओर,

हूमहई म हूम ममहागे, कउँवा ह बने हे परुवार।।

 

मुरदा मन के मान-गुन होथे, चढ़थे फूल के हार,

कलप-कलप के जम्मो रोथें, सुरता के बाँधे गठरी।

पितर मन के बंदगी करे ले तोला मिलही पितर,

तँय भगवान ल सुमर, लमाके भक्ति के सुतरी।।

 

जीते-जियत म सेवा कर, झन कर मरे के अगोरा,

ओही मन भुइयाँ के देवता, मत भेज बुढ़वा घर।

सियान मन के आरती उतार, चरन धो-धो के पी ले,

घर ह बैकुंठ बनही, उँखर जीव जुड़ाही हर बछर।।

– अशोक कुमार यादव , मुंगेली छत्तीसगढ़

 

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