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बेटी का आँगन – अमित कुमार

किसी बेटी की शादी में जाना,

और बारात का देर से आना,

घड़ी की सुइयाँ चुभती हों जैसे,

हर पल मन को तड़पाना।

समय की मर्यादा भूल वहाँ

जब लड़के वाले इठलाते हैं,

द्वार सजा है, दीप जले हैं,

पर मन भीतर घबराते हैं।

रिश्तेदारों की भीड़ लगी हो,

मुस्कानों का हो मेला,

पर पिता के सूखे होंठों पर

चिंता का गाढ़ा रेला।

कोई गले मिले, लिफाफा दे,

औपचारिकता निभाता है,

पर कौन पढ़े उस दिल की भाषा

जो भीतर-भीतर घबराता है।

रसोई में थककर बैठी माँ,

आँचल से पसीना पोंछ रही,

सपनों की गठरी बाँध-बाँधकर

चुपके से आँखें भिगो रही।

कभी सोचा है लड़की वाले की

उन नाज़ुक सी भावनाओं को?

वर्षों जिसको फूल-सा पाला,

आज सौंप रहे अरमानों को।

बेटी की हर मुस्कान के पीछे

पिता का टूटा अभिमान छुपा,

“सब ठीक रहे” बस यही दुआ,

हर शंका में भगवान छुपा।

शादी केवल उत्सव नहीं है,

यह त्याग, तपस्या, समर्पण है,

लड़की वालों के धड़कते दिल का

सबसे कोमल सा दर्पण है।

आओ कुछ संवेदनाएँ जोड़ें,

समय का भी सम्मान करें,

किसी के घर की लाज बचाएँ,

रिश्तों का सच्चा मान करें।

क्योंकि जिस आँगन से बेटी विदा हो,

वहाँ शोर नहीं, सिसकी होती है…

और उस दिन लड़की वालों की

हर मुस्कान भी नम-सी होती है।

– अमित कुमार बिजनौरी, बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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