मेरे राम, सबके राम’ – डॉ ओम प्रकाश मिश्र मधुब्रत

utkarshexpress.com – सुधीर श्रीवास्तव का काव्य-संग्रह ‘मेरे राम, सबके राम’ 82 रचनाओं का संवेदनशील संकलन है। पुस्तक में भक्ति, अध्यात्म, प्रकृति, परिवार, राष्ट्र, नारी, सामाजिक विसंगतियों तथा मानवीय संबंधों को विविध कोणों से अभिव्यक्त किया गया है। साधनावादी समीक्षा के 11 प्रतिमानों पर इसे परखने पर कृति की सार्थकता स्पष्ट होती है।
1. कथ्य—रचनाओं का कथ्य जीवन और समाज से गहरे जुड़ा है। राम यहाँ मर्यादा और जीवन-मूल्यों के प्रतीक हैं।
2. जीवन-दृष्टि—कवि की दृष्टि आस्था, संघर्ष, आत्मविश्वास और सकारात्मक जीवन-बोध से निर्मित है।
3. चिंतन—अयोध्या, राम, आजादी, रिश्ते, पर्यावरण और सामाजिक प्रश्नों के माध्यम से कवि विचारोत्तेजक प्रश्न उठाता है।
4. संवेदना—माँ, बेटी, रिश्तों, राष्ट्र और पीड़ित मनुष्य के प्रति आत्मीय संवेदना संग्रह की प्रमुख शक्ति है।
5. लोकमंगल—नारी-सम्मान, पर्यावरण-संरक्षण, सामाजिक जागरूकता और नैतिक जीवन का संदेश लोकहित की भावना को पुष्ट करता है।
6. भाव-सौंदर्य—भक्ति, करुणा, वात्सल्य, देशप्रेम और प्रकृति-प्रेम के भाव सहज रूप में उभरते हैं।
7. भाषा—भाषा सरल, सहज, आत्मीय और जनसामान्य के निकट है।
8. शिल्प—मुक्तछंद सहित दोहा आदि विविध काव्य-रूपों का प्रयोग रचनात्मक विविधता देता है।
9. मौलिकता—राम को केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सार्वभौम मानवीय मूल्य के रूप में देखने की दृष्टि उल्लेखनीय है।
10. सांस्कृतिक चेतना—राम, अयोध्या, भारतीय परंपरा और राष्ट्रीय संस्कारों के माध्यम से सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव दिखाई देता है।
11. आत्मपरिष्कार एवं नवचेतना—कृति पाठक को आत्मचिंतन, नैतिकता, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर प्रेरित करती है।
अतः ‘मेरे राम, सबके राम’ में साधना से संवेदना और संवेदना से लोकमंगल की यात्रा दिखाई देती है। पुस्तक का मूल प्रश्न अंततः यही बनता है—राम को मानना ही नहीं, राम के मूल्यों को जीवन में उतारना कितना आवश्यक है।
पुस्तक समीक्षा -मेरे राम, सबके राम’
~समीक्षक- डॉ ओम प्रकाश मिश्र मधुब्रत
(अज्ञातमेघार्जुनजमदग्निपुरी)




