मैं समय हूँ (शीर्षक, विचार और केंद्रीय विंदु) – डॉ. जयप्रकाश तिवारी

utkarshexpress.com – आलोच्य काव्य संग्रह का नाम है – मैं समय हूं। इस शीर्षक में तीन पद हैं – “मैं”, “समय” और “हूं”। ये तीनों ही पद गहन दार्शनिक वृत्ति वाले हैं और इस काव्य संग्रह के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के द्योतक हैं। इसमें “मैं” स्व की अस्मिता और “हूँ” अस्तित्व वाचक शब्द हैं तथा इन दोनों के मध्य में शब्द आया है – “समय”। यह समय ही मैं और उसकी क्रिया की भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पहचान है। अब इस “मैं” की पहचान, गुणवत्ता और उपयोगिता की कोटि का निर्धारण इस “समय” में ही अन्तर्भूत है। समय ही “मैं” की अस्मिता और “हूं” के अस्तित्व का नियामक मापक है। एक ही “समय” काल की दृष्टि से तीन भागों में बंटा हायदिखता है – “भूत”, “वर्तमान” और “भविष्यत्’। भूत पर इस मैं का अधिकार नहीं, किंतु भविष्यत् को आशावादी, सर्वोपयोगी, स्वर्णिम बनाने का मूलमंत्र इस “वर्तमान” में छिपा है। वर्तमान को सुधारकर, सुन्दर और सुखद भविष्य की परिकल्पना को सार्थक बनाया जा सकता है। वर्तमान ही भूत का मूल्यांकन, संशोधन कर भूत की त्रुटियों का निवारण कर सकता है। इस प्रकार इन तीनों ही काल खंड़ो में सर्वाधिक महत्वपूर्ण “वर्तमान’ ही है। इस संग्रह में कवि ने भूत की त्रुटियों का मूल्यांकन भी किया है और सुखद भविष्य की परिकल्पना भी तथा इसमें सुधार हेतु अनेक महत्पूर्ण प्रयास भी दिखता है। कवि केवल भूत का या वर्तमान का दृष्टा नहीं है। वह समाज का सर्जक भी है। सर्जना और सृजन का यह दायित्व, यह अधिकार उसे अपनी सांस्कृतिक चेतना, शास्त्रीय संवेदना रूप में शास्त्र की विरासत में मिला है – “कविर्मनीषी परिभूस्वयंभू: …”। मनीषी होने के नाते यह अधिकार केवल कवि, संवेदनशील हृदय और प्रखर चिंतक बुद्धि को ही प्राप्त है। हृदय अत्यंत भावुक होता है तथा बुद्धि भावहीन शुष्क व्यवहारिक पक्ष। कवि इन दोनों में उचित सामंजस्य रखता है। इसलिए यह अधिकार कवि को ही प्राप्त है। कवि का मुखर होना ही उसके कवित्व की सार्थकता है। यहां इस काव्य संग्रह में कवि की वाणी मुखर है; वह सुझाव के रूप में भी है, उपलंभ रूप में भी है और प्रहार के रूप में भी।
इसी विंदु पर समय का भौतिक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक मूल्य अत्यधिक बढ़ जाता है। यहीं पर “समय”, “मैं” और “हूँ” इन दोनों का नियामक बन जाता है; क्योंकि कृति के बिना बड़े – बड़े काल्पनिक आदर्शों का भी कोई मूल्य नहीं। वे आदर्श, चिंतन, प्रलाप, दिवास्वप्न बनकर ही रह जाएंगे। इसी निहितार्थ को अपने कथन में अभिव्यक्त किया है विद्वान भूमिका लेखक प्रोफेसर (डॉ.) विनोद कुमार जी ने (समय-साक्षी, समय-दृष्टा, समय-स्वयंभू) कहकर।
कवि का संवेदनशील मन अब दृष्टा या साक्षी बनकर तटस्थ भाव नहीं रहना चाहता; वह क्रियाशील होकर समय को मूल्यवान, आदर्श का प्रतिमान बनाकर एक सर्वमान्य लोक मंगलकारी नियामक बना देना चाहता है। इस बात का प्रमाण है पूर्व में प्रकाशित/लोकार्पित कवि के दो काव्य संग्रह (i) “उम्मीद की लौ” और (ii) “अंधेरे में से…”। यह समय की क्रियाशील उपयोगिता ही है जो अंधेरे की पहचान करके आशा और उम्मीद की लौ जलाता है। आशा को सही दिशा में गतिमान देख जब कवि अपना स्व-मूल्यांकन करता है, उसमें अपने कर्म, क्रिया, परिणाम को देखता है तब उसका अंतःकरण संतुष्टि भाव में बोल उठता है – हां “मैं समय हूं”। वैसे समय तो वह तब भी था, जब क्रियाशील नहीं था; साक्षी था, दृष्टा था, तटस्थ था, उदासीन था, दायित्वबोध से शून्य था। किंतु संवेदनशील मानव होने के नाते, राष्ट्र के जागरूक नागरिक होने के नाते, कविकर्म बोध ने जब उसे झकझोरा, निद्रा खुली, तंद्रा टूटी तो लेखनी ने भरपूर साथ निभाया और हमने उनके दो काव्य संग्रह, और संपादक के रूप में “आभासी दुनिया का सच” व समालोचक के रूप में “रचना शीलता का गणित” कृति रूप में भी देखा। और आज काव्य संग्रह रूप मे इस नवीन पुस्तक को हम सब देख रहे हैं जिसका नाम है – “मैं समय हूं”।
संग्रह में आक्रोश, उद्गार और सुझाव:-
इस काव्य संग्रह “मैं समय हूं” में कवि ने समय के रूप में अपनी अस्मिता और अपने कर्त्तव्य का निर्धारण किया है तथा इसका उल्लेख “मेरी कविता” शीर्षक से मौन को तोड़ते हुए हुंकार भरी है – “शब्दों के जकड़न से / मुक्त होना चाहती है / मेरी कविता”। प्रश्न है, कौन सी जकड़न? किस जकड़न से मुक्त होना चाहता है कवि? इस प्रश्न का उत्तर भी इसी कविता में ही है। वह जकड़न थी गुनाह पर भी चुप्पी, मौन धारण किए रहना। वह देख रहा था यह सच्चाई कि – “सुविधा भोगियों ने / दबा रखा था / बंधनों में जकड़ रखा था / शब्दों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया था”। और आज जब इस विकृति और अव्यवस्था के विरोध में कवि ने अपनी सशक्त आवाज उठाई तो क्या परिणाम हुआ? वही हुआ जो हमेशा से होता रहा, बढ़े कदम को रोकना, उसे दबाना, भय से भी और लोभ -लालच से भी। लेकिन उत्साही वीर की तलवार और सच्चे कवि की कलम क्या कभी रुकी है? कभी झुकी है? रुकते तो हैं भीरू और लोभी; सत्य और संवेदना के पथिक कभी नहीं। हां, इस नेक कार्य में बाधाएं आती हैं और कवि के जीवन में भी आयी हैं। वे लिखते हैं – “अभी जीवन को गढ़ना / शुरू ही किया / अभी – अभी / नए अध्याय के लिए / दौड़ता भागता रहा / लेकिन हरबार कोशिश में / विघ्न पड़ता रहा / लोग भी फब्तियां कसते रहे / लोगों की निगाह में / तमाशा बनता रहा / … उनकी इच्छा थी /… अपनी योग्यता को छिपाऊं / अधिकार की ओर न जाऊं / उन्हें सुनता जाऊं / आंख, कान खुले रखूं / पर मुंह बंद रखूं / डर और भय के / शिकंजों के गिरफ्त में / कैद रहूं / हमेशा हमेशा के लिए”।
यह कवि इतना साहसी कि सत्ता की जनविरोधी नीतियों के विरोध में क्रूर, कठिन और घृणित शब्दों से बचने का प्रयास नहीं करता और आक्रोश में उन सभी अपराधियों को आदिम, चोर, चील, गिद्ध, काली भिनभिनाती मक्खियां, यहां तक कि सूअर भी कह देता है। यह संवेदी कवि ऐसे तीक्ष्ण शब्दों का प्रयोग अपनी भलाई के लिए नहीं सामान्यजन, समाज और सर्व कल्याण के लिए करता है। कवि का स्पष्ट मानना है कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था समाज के लिए है, राष्ट्र कल्याण के लिए है। वह लिखता है – “व्यवस्था में मानवीय संबंध / विकसित हुए / सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा में / संत समाज की / पुनः स्थापना हुई / धर्म को हिंदुस्तान मिला / संयमित, संगठित आवाम भी / पेशगी पर पले निखट्टू / दलालों का हस्र अधः पतन / अब जोकर भी नहीं बन सकते / न पशु / न मानव”।
कवि अपने जीवन में एक दार्शनिक और सधे हुए वैज्ञानिक की भांति चिंतन और परीक्षण से जीवन के मूलभूत उद्देश्यों को समझने का प्रयास करता है किंतु अब उसका विस्तार “यज्ञशाला” और “प्रयोगशाला” इन दोनों की सीमाओं का अतिक्रमण कर उसका विस्तार जगत तक जा पहुंचता है, देखिए – “जिंदगी क्या गजब ढा गई / …. किताब अब बंद मत कर / मेल से खोल / सच और झूठ का / जिंदगी खिताब दे गई” । कवि की तड़प क्या है? वह इतना व्यथित क्यों है? वह सोचता है मानवीय बोध के दो स्तर हैं “हृदय” और “बुद्धि”, हृदय पक्ष भावनात्मक होता है, शोक, मोह से आवेशित भी; किंतु बुद्धि पक्ष क्रूर होता है, भावनाओं से सर्वदा पृथक होता है, किसी शल्यचिकित्सक की छुरी, कैची की तरह। यदि बात इतनी हो तो स्वीकार्य है क्योंकि यह निदान और समाधान के लिए है। किंतु यह “बुद्धि” यदि निदान को छोड़कर स्वार्थी और लोभी हो जाय तब? तब यह कवि को स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यहां मार्ग और उद्देश्य में भटकाव भी है, और एक सोची समझी स्वार्थपरता भी। अब कवि को मुखर होना ही पड़ता है – “बुद्धि हावी है / शुद्धि पर / सत्य पर”। अपनी बुद्धि को, मति को सुबुद्धि, सुमति में बदलना ही इंसानियत है, यही प्रगति और उत्थान है। इस बुद्धि को सुबुद्धि बनाने के लिए विवेक रूपी विशाल हृदय समाज सुधारक बनकर अवतरित होता है – “कोई दिव्य पुरुष इस अन्याय और शोषण के खिलाफ / ध्वंस करता पाप के घेरे / जकड़े हुए/ … जो मथता है / वही रचता है” … यह कोई हैं बात नहीं है। सत्ता प्रायः भटक जाती है किंतु समय बहुत बलशाली है -“समय की मार से / सबकुछ बाहर आ जाता है / देर सबेर अंकुरित होता है / जैसा बीजता है / वही काटता है / … समय तुम्हे / अपने करीब ले जा रहा है / बिल्कुल मौन …/ समय के अधीन / यदि समय रहते / समय याद रहता / अपनी यात्रा में सुकून होता / मन और मति में बहस होती है / नित्य / प्रतिदिन”। यह बहस ही वह मथानी है जिसको मथने से दही से नवनीत निकलेगा। यहां कवि एक आशावादी के रूप में समय की प्रतीक्षा भी करता है सुखद भविष्य और प्रगतिशील, समृद्ध राष्ट्र के लिए। वह असंतुलित प्रकृति, दिशाहीन शिक्षा, चारित्रिक पतन, नर संहार और युद्ध के प्रति भी चिंतित है। हृदय और संवेदना को नकार कर ऐसा शुष्क बौद्धिक प्रगति कवि को कदापि स्वीकार नहीं, जहां हिंसा और शोषण को समाधान माना जाए। वह हृदय और भाव पक्ष की ओर लौटना चाहता है, उसकी धारणा है – “लौटना ही सत्य है / चलो इस भंवर से लौट चलें / अपने घर संसार और / अपने आप में”।
अब इस विंदु पर वह “समय” को भूत, वर्तमान और भविष्यत; अतीत, कालातीत की बात करता है, अब वह काल की नहीं, “महाकाल’ की बात करता है जो नित्य है, सत्य है, अकाल और अविनाशी है। वह समय के तीनों अवये वो की चर्चा करता है – “अर्द्ध संधि पर खड़ा / ताक रहा हूं / बचपन, जवानी और बुढ़ापे की ओर”। अब वह सीमित और संकुचित नहीं होना चाहता। वह झटक देता है सीमित प्रतीकों और संकीर्ण विचारों को – “मुझे झंगड़ों से दूर रखो / … मैं फिर कहता हूं / अगर तुम सचमुच बदलाव / समरसता चाहते हो / समय को यूं ही / जाया न करो”।
इस पूरे काव्य संग्रह में कवि प्रचलित व्यवस्था से असंतुष्ट एक समाज सुधारक के रूप में आता है, वह समस्याओं का सम्यक विश्लेषण करता है, कभी दार्शनिक बनकर, कभी वैज्ञानिक बनकर, और कभी सत्य का पुरोधा बनकर। वह शांति और प्रगति चाहता है किंतु हृदय हीन होकर, शुष्क स्वार्थी होकर नहीं, सभी में सुसंगत सामंजस्य बिठाकर। शासन और सत्ता को इस संग्रह में एक दृष्टि मिलेगी, उत्तम सुझाव मिलेगा। आशा की जानी चाहिए कि इस पुस्तक “मैं समय हूं” के रचनात्मक सुझाव अपने गंतव्य तक पहुंचेंगे, सत्ता और शासन तंत्र भी इसपर विचार करेगा। त्रुटियों और नीतियों में सकारात्मक परिवर्तन होगा, कवि का चिंतन एकदिन रंग लाएगा, सार्थक परिवर्तन दिखेगा।
“मैं समय हूं”‘ पुस्तक को पढ़ना, समझना केवल साहित्य में डूबना नहीं है, समाज के कटु सत्य और झंझावातों से परिचित होना और कवि की प्रतिक्रियाओं से पग-पग पर स्पंदित होना भी है। आप कवि के विचारों से सहमत या असहमत तो हो सकते हैं किंतु उनसे किनारा नहीं कर सकते क्योंकि ये समस्याएं आपकी अपनी है। ये उद्गार आपके लिए हैं और कवि आपका समर्थन आपकी की भलाई और प्रगति के लिए चाहता है। वह एक सामाजिक योद्धा है, समाज और सामाजिक बुराइयों का विश्लेषण प्रखर दार्शनिक और वैज्ञानिक बनकर करता है। अनीति, अन्याय के विरुद्ध सीना खोलकर वीरता के साथ खड़ा है, निष्क्रिय नहीं, साहस और क्रियाशीलता के साथ। इन कविताओं का पढ़ना सत्य को समझना और स्वयं के भीतर गहरे उतरने का अनुभव और कर्तव्य बोध दोनों ही है। “समय” सबका साक्षी है, सभी को समान अवसर देता है, समस्याओं के निदान के लिए। ये अनुभवी कविताएं घुलमिलकर मिलकर एक ऐसी काव्य भूमि रचती हैं जहां आप उदासीन नहीं रह सकते। समय को पहचानिए और समय की आवाज सुनिए। इन तीखे व्यंग्यों और प्रतीकों की भाषा समझिए और उठ खड़े होइए।
इसमें काव्य का अपना एक अलग ही सौंदर्य बोध है, कबीर जैसी बेझिझक आक्रोश और आतताइयों से जूझने की उत्साह। इस पुस्तक की काव्य भाषा कहीं “बीज रूप” में हैं तो कहीं “लंबी रचना विश्लेषण” के रूप में। किंतु इनका निहितार्थ सरल और सुबोध है। भाषा की सजावट के प्रति कवि कभी आग्रही नहीं रहा, जो स्वतः आ गए तो आ गए, न आए तो मनुहार भी नहीं। तथापि कुछ रोचक और सार्थक लोकोक्तियां और मुहावरे प्रसंगवश आ ही गए हैं।
कवि के इन उद्गारों को समझना होगा और सर्व सामान्य को इन बुराइयों के विरुद्ध जूझना पड़ेगा। हम सभी को आदर्श की स्थापना के लिए कवि की भावनाओं के साथ खड़ा होना चाहिए। इन्हीं अपेक्षाओं के साथ चिंतक कवि श्री दिलीप कुमार पाण्डेय जी को कोटिश: साधुवाद।
पुस्तक समीक्षा –
पुस्तक का नाम: मै समय हूं (काव्य संग्रह)
कवि: श्री दिलीप कुमार पांडेय, फगवाड़ा, पंजाब।
समीक्षक: डॉ. जयप्रकाश तिवारी, बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
प्रकाशक: बिंब – प्रतिबिंब प्रकाशन, फगवाड़ा, पंजाब।
प्रकाशन वर्ष: 2025
पृष्ठ संख्या: 136
मूल्य: – 279




