मनोरंजन

अधूरी ख्वाहिशे जिंदगी की – नीलांजना गुप्ता

अधूरी ख्वाहिशें जिन्दगी की लुभाती हैं।

मृगतृष्णा के रेगिस्तान में दौड़ाती हैं ।।

 

अपनी परछाई यहाँ कौन पकड़ पाया है।

हैं दिवास्वप्न ये इंसान को घुमाती हैं।।

 

सबने पलकों पे कितने स्वप्न पाल रखें हैं

कितनी उम्मीदों के मोती सम्भाल रखें हैं।।

 

मुठ्ठी में बंद रेत सी फिसलती जाती है।

एक एक सांस नित पैग़ाम नया लाती है।।

 

रातदिन हम खयालों के दुकूल बुनते हैं।

सच है अनजाने में स्वयं को ही छलते हैं।।

 

चाह की चाह ही इंसान को भरमाती हैं।

झीने पर्दे सी है ये नजर कहाँ आती है।।

-नीलांजना गुप्ता बाँदा, उत्तर प्रदेश

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button