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अलबेली ऋतु शरद की – डॉ क्षमा कौशिक

सर्दी पर छाया हुआ यह कैसा उन्माद।
सूरज भी मद्धम हुआ, बढ़ता देख प्रमाद।।
पंछी कोटर में छिपे, ढाँप पंख में शीश।
तीर सरिस वायु बहे, जमने लगे गिरीश।।
तुहिन कणों को शीश पर सजा रही है दूब।
चादर कोहरे में लिपट, धूप रही है ऊब।।
बगिया ओढ़ें सज रही, गेंदा फूल दुकूल।
पीत केसरी रंग हैं, चंपा नर्गिस फूल।।
रजनीगंधा जासमिन, खिलता फूल गुलाब।
पारिजात के पुष्प की, अजब निराली आभ।।
हरा शीत को नाचते, सभी युवा शिशु वृंद।
ऋतु अलबेली शरद की, छाया परमानंद।।
बच्चों को न छेड़ती, बूढों पर है जोर।
युवा थकाएँ ठंड को, जोश भरे पुरजोर।।
डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून




