असीम संबल – डॉ. दीपा शर्मा

utkarshexpress.com संसार में कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें शब्दों के तराजू पर तौला नहीं जा सकता। जब कोई अपना इस दुनिया को अलविदा कहकर हमेशा के लिए चला जाता है—चाहे वह पिता हों, माँ हों या जीवनसाथी—तो मनुष्य भीतर तक छिन्न-भिन्न हो जाता है। उस क्षण न धरती सूझती है, न आसमान। मन करता है कि जाने वाले की रूह के साथ ही उड़ जाएँ।\ आस-पास सांत्वना देने वालों का ताँता लगा था। कोई आता, ढाँढस बँधाता, कोई हाथ थामकर कहता—“हम हैं तुम्हारे साथ।” और फिर चला जाता। लेकिन जो भीतर से टूट चुका था, उसे जोड़ पाने का सामर्थ्य किसी के पास नहीं था।
घर के आँगन में पिता की मृत्युशय्या रखी थी। वातावरण में एक असीम वीरानी पसरी हुई थी। हर चेहरा उदास था, हर आँख नम थी। तभी सबकी दृष्टि उस पंद्रह-सोलह वर्ष की मासूम बच्ची पर पड़ी, जो अपने पिता के निश्चेत शरीर के पास शांत खड़ी थी।उसकी आँखों से आँसू नहीं बह रहे थे, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी थरथराहट थी—एक ऐसा भर्राया हुआ दर्द, जो बिना आँसू के भी बहुत कुछ कह रहा था। जब भी कोई आत्मीय उसे सांत्वना देने के लिए गले लगाता, वह अपने आँसू भीतर ही भीतर पीकर बस इतना कहत\“आंटी… मेरी मम्मी को संभाल लीजिए…
आंटी… मेरी छोटी बहन का ध्यान रखिए…”उस छोटी-सी बच्ची के भीतर उस समय दो भावनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। मन चाहता था कि वह अपने पिता के सीने से लिपटकर फूट-फूटकर रोए। उन्हें पुकारे, उन्हें झकझोरे और अपनी आखिरी साँस तक उनसे लिपटी रहे।लेकिन मस्तिष्क उसे उसकी जिम्मेदारियों का एहसास करा रहा था।उसे दिखाई दे रहा था कि उसकी माँ का सुहाग उजड़ चुका है और बारह-तेरह वर्ष की उसकी छोटी बहन अचानक बेसहारा हो गई है।जिस छोटी बहन को वह कल तक छोटी-छोटी बातों पर डाँट दिया करती थी, आज उसी को उसने अपने सीने से पूरी ताकत से लगा रखा था।ईश्वर जाने, इतनी छोटी-सी उम्र में उसके भीतर इतनी हिम्मत और इतना विशाल हृदय कहाँ से आ गया था!उसने अपने निजी शोक को एक ओर रखकर पूरे परिवार का संबल बनने का कठोर निर्णय ले लिया था।उसके भीतर का मन चीख-चीखकर अपने पिता को पुकार रहा था—“पापा… आप मुझे ऐसे अकेला छोड़कर कैसे जा सकते हैं?
मुझे आपकी बहुत याद आ रही है…
मुझे भी अपने साथ ले चलिए…”लेकिन जैसे ही उसने माँ का निस्तेज चेहरा देखा और बहन के काँपते हाथों को महसूस किया, उसके आँसू वहीं ठहर गए।उसने मन ही मन अपने पिता से कहा—
“पापा, आप बेफिक्र होकर जाइए।
मैं जानती हूँ, अब इस घर की बड़ी बेटी होने के नाते
मुझे ही माँ और बहन की ढाल बनना है।
मैं आपके जाने का दुख तो अपने भीतर रखूँगी,
लेकिन माँ और बहन को टूटने नहीं दूँगी।
मैं उन्हें संभालूँगी…
क्योंकि अब यही मेरी जिम्मेदारी है।”
उस दिन वह बच्ची केवल अपने पिता को खोकर बड़ी नहीं हुई थी—
वह उसी दिन अपनी उम्र से कई वर्ष बड़ी हो गई थी।
उसने अपने आँसुओं को पीकर अपने परिवार के लिए हिम्मत का आँचल तान दिया था।
कुछ बेटियाँ विदा होकर घर छोड़ती हैं,
और कुछ बेटियाँ पिता की विदाई के बाद
पूरे घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा लेती हैं।
ईश्वर उस बच्ची की रक्षा करे…
उसकी उस अद्भुत हिम्मत को नमन करे…
और उसके हृदय को वह असीम संबल देता रहे,
जिसकी उसे अपने पिता के बाद सबसे अधिक आवश्यकता है।
— डॉ. दीपा शर्मा उजाला, फरीदाबाद




