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आम आदमी क्यों भुगते भ्रष्ट व्यवस्था की सजा (दृष्टिकोण) – डॉ. सुधाकर आशावादी

utkarshexpress.com – आम आदमी की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की उपलब्धता एक बड़ी समस्या है। इन मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आम आदमी जीवन भर संघर्ष करता रहता है। अधिकांश आबादी का सपना होता है, कि उसके सर पर अपनी छत हो, सो जोड़, तोड़ करके वह जैसे तैसे अपने लिए मकान की व्यवस्था करता है, रोजगार के लिए व्यावसायिक प्रतिष्ठान की स्थापना करता है। ऐसे में यदि आम आदमी के मकान को अवैध निर्माण बताकर ध्वस्त करने की बात की जाए, तो उसके सम्मुख जीवन मरण का प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है। देश के विभिन्न नगरों व महानगरों में आम आदमी इसी आशंका से ग्रस्त है, कि कहीं उसके मकान को अवैध निर्माण घोषित करके ध्वस्तीकरण की कार्यवाही न कर दी जाए।
बहरहाल सत्य यही है, कि आम आदमी के सपने को जहां निजी कॉलोनाइजर पूरा करते हैं, वहीं सरकारी एजेंसियां भी उनका भरपूर साथ निभाती हैं, जिन मकानों को अवैध निर्माण बताया जाता है,उनमें से अधिकांश
निर्माण सरकारी भ्रष्ट व्यवस्था की सरपरस्ती में ही होते हैं। चाहे आवास विकास परिषद से जुडी सम्पत्तियाँ हों अथवा विकास प्राधिकरणों से जुड़ी सम्पत्तियाँ, चाहे निजी प्लाटिंग,इनमें नियमानुसार निर्माण हो रहा है या
नहीं, इसका सर्वेक्षण करने तथा अवैध निर्माण होने पर ध्वस्तीकरण की कार्यवाही करने का अधिकार सम्बंधित नगर से जुड़े विकास प्राधिकरणों का होता है, किन्तु यदि अवैध निर्माणों पर अंकुश लगाने का दायित्व धारण करने
वाली एजेंसियां ही अपने कर्तव्य से विमुख होकर अवैध निर्माण अपनी नाक के नीचे कराएं, तो इसका दोषी कौन होगा, क्या अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप अपने लिए आवास की व्यवस्था करने वाला आम आदमी या विकास प्राधिकरणों के वे अधिकारीगण, जिनके कार्यकाल में तथाकथित अवैध निर्माण हुआ हो ?
संपत्ति व्यवसाय में अवैध निर्माण की स्थिति को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। आम आदमी यह नहीं समझ पा रहा है, कि जीवन भर की कमाई से अपने सर पर छत जुटाने के उपरांत भी क्या वह अपने घर में सुरक्षित है, यदि नहीं, तो क्या उसे बेघर कर दिया जायेगा। देश भर में समय समय पर इस प्रकार की स्थिति आती
रहती है, कि जब बड़ी बड़ी कॉलोनियां अवैध घोषित की जाती हैं तथा चुनावों के समय उन कॉलोनियों को वैध घोषित कर दिया जाता है। दिल्ली जैसे महानगर
में ऐसा अनेक बार हुआ है।
विचारणीय बिंदु यह भी है, कि अवैध निर्माण की
परिभाषा में जिन कॉलोनियों को चिन्हित किया जाता है, उन कॉलोनियों में विद्युत, पानी व रसोई गैस की सप्लाई किस आधार पर सुनिश्चित होती है ? क्या विकास प्राधिकरणों, नगर निकायों, विद्युत वितरण कंपनियों को किसी भी कॉलोनी के अवैध होने से कोई सरोकार नहीं, यदि उनकी संलिप्तता अवैध कॉलोनियों के निर्माण में है, तो उनके भ्रष्टाचार की सजा आम आदमी क्यों भुगते? (विनायक फीचर्स)

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