एक स्त्री – रश्मि मृदुलिका

एक स्त्री जब स्नेह करती है |
तब समर्पित हो जाती है|
उस कंधे के लिए,
जिस पर सिर रख अश्रु बहा सकती हैं|
एक स्त्री जब निभाने पर आती हैं|
तब सर्वस्व सौंप देती है|
उन बातों के लिए ,
जो उसकी आत्मा को छूते हैं|
एक स्त्री जब भावनाओं में बहती है|
तब स्वयं को भूल जाती है|
और बना लेती है अपने महबूब को,
अपना भाग्य और ईश्वरीय स्वरूप|
एक स्त्री जब विश्वास करती है|
तब मौके देती है हर झूठ को,
थामे रखती है रिश्तों की डोर,
बांहे पसार स्वागत करती है हर बार
एक स्त्री जब जब बंधन में बंधती है|
तब रिश्ते उसकी पूंजी होते है|
सपनों को हवन कुंड बना कर,
स्वयं को होम कर देती है|
एक स्त्री जब खुद को सोचती है|
तब सर्वहारा बन जाती हैं|
स्वार्थ का साधन बन कर,
अपने विराटत्व से छिटक कर सुक्ष्म हो जाती हैं|
एक स्त्री जब प्रेम करती है|
तब बन जाती हैं राधा,
समाज के रीति रिवाज से मुक्त,
समाजिक भय के विरुद्ध हो जाती हैं खड़ी ,
महबूब की आंखों से दुनिया देखती है|
एक स्त्री जब उपेक्षित की जाती है|
तब निर्विकार हो जाती है|
बिना क्रोध और मोह विहीन होकर,
आगे बढ़ जाती है|
कभी न लौट आने के लिए |
-रश्मि मृदुलिका, देहरादून, उत्तराखंड




