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कबीर एक बरगद – दीपक राही

कबीर एक बरगद है,
जो फैला हुआ है,
उसकी ज्ञान की शाखाएँ
सदा जुड़ी रही हैं ज़मीन से।
न मंदिर का है,
न मस्जिद का,
वह बस धरती का है।
उसकी शाखाओं पर
लटकते हैं ताने,
जात, पंथ, और ढकोसले,
और वह उन्हें
पत्तों-सा झटक देता है।
अनसुने प्रश्नों का
उत्तर बना,
न ग्रंथों से बोला,
न वेदों से डरा।
उसकी छाया में
बैठते हैं वंचित वर्ग के लोग,
और वे सुनते हैं।
“कबीरा खड़ा बाज़ार में,
लिए लुकाठी हाथ।
जो घर फूंके आपना,
चले हमारे साथ।”
वह बरगद
हर दौर में जलाया गया,
पर हर राख से
नया बीज उपजा।
वह समय का वृक्ष है,
ना झुका,
ना झड़ा,
ना मिटा।
कबीर एक बरगद है,
जहाँ ठहरते हैं
बेचैन लोग
एक साँस भर को।
– दीपक राही, आर एस पुरा,
जम्मू , जे० एंड के०




